14 सितम्बरी हिन्दी दिवस के विरोध में विश्रामघाट क्षेत्र में प्रदर्शन
राष्ट्रीय हिन्दी दिवस आन्दोलन की पहल
मथुरा,
18 अप्रैल में छिपे हिन्दी के भावी विकास को लेकर 14 सितम्बरी राष्ट्रीय हिन्दी दिवस के विरोध में डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में राष्ट्रीय हिन्दी दिवस आन्दोलन के अगले क्रम में गुरूवार को विश्रामघाट क्षेत्र में प्रदर्शन किया गया।
संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं 18 अप्रैली विश्व हिन्दी समेत राष्ट्रीय हिन्दी दिवसीय आन्दोलन के प्रवर्तक डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि सरकार 14 सितम्बरी राष्ट्रीय हिन्दी दिवस की आड़ में 18 अप्रैली हिन्दी दिवस के उस स्वर्णिम अध्याय की उपेक्षा कर रही है जिसको लेकर 19वीं सदी के पाश्चात्य विद्वान 63 वर्षों तक संघर्षरत रहे थे। आगे कहा कि 1837 से सरकारी कामकाज से फारसी का बहिष्कार तो सिर्फ अपमान की बात थी। मगर हिन्दी को फारसी समेत अंग्रेजी के दोहरे पाटों बीच उस लम्बे समय तक पिसना पड़ा, जब तक कि भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय ने उसे 18 अप्रैल 1900 को उत्तर प्रदेश में सरकारी कामकाज का दर्जा दिलाकर उबार नहीं लिया। कहा कि 19वीं सदी के हिन्दी संघर्ष की प्रादेसिक दास्तां आज भी रोमांच पैदा करती है। जब कोई फ्रेडरिक जान शोर, पिंकौट, डब्ल्यू0 एच0 ग्रीव्स समेत एफ0 एस0 ग्राउज आदि पाश्चात्य विद्वानों की हिन्दी निष्ठा से रूबरू होता है। जिनके अकाट्य तर्कों और महामना की प्रस्तुति के सामने ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और हिन्दी सरकारी कामकाज की भाषा के दर्जे पर पुनः प्रतिष्ठित हुई।
डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि आजादी के बाद सरकार ने 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी हित में राजभाषा के नाम कर उत्तरप्रदेश के हिन्दी संघर्ष को दोहराया है जब कि उसके लिए संविधान क्रियान्वन की तर्ज पर 18 अप्रैल सबसे माकूल दिन था जो देशवासियों को 15 अगस्त और 26 जनवरी की तरह प्रेरणा प्रदान करता रहता। लेकिन इसे अज्ञान कहें या शोहरत की भूख जिसने राजभाषा के पैरोकारों को प्रभावकारी हिन्दी अतीत पर सोचने का मौका नहीं दिया।
डॉ0 शर्मा ने क्षोभ जताया कि हिन्दुत्व की तरह हिन्दीत्व भी पीडि़तों के संकटमोचन की भूमिका में उपयोग की जाती रही है जिसका हालिया अंदाजा व्यापमं, ललित मोदी विवादों के चलते बाधित संसदीय कार्यवाही और महामना स्मारक परियोजना की चोरी, शोषण व दुरूपयोग में दिखाई दिया। नतीजन परियोजना के अन्तर्गत संस्थान द्वारा वर्ष 2015 में मथुरा से शुरू 18 अप्रैली विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन एवं तदनुसार उठी मांग को सरकार ने बाधित संसदीय कार्यवाही से डूबती मध्यप्रदेश की भाजपाई नैया उबारने में दुरूपयोग किया और बनारस में संभावित दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में आयोजित कराया गया। आगे कहा कि हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान समयसमय पर निजी हितों की रक्षा में कवच बनाये जाते रहे हैं इसलिए तीनों इंग्लिश, इंग्लिशमैन और इंग्लैण्ड के मुकाबले पिछड़ते गये। जिसके चलते अंग्रेजी जो हिन्दी के आगे कहीं ठहरती नहीं थी, वह तो विश्व में छा गई और हिन्दी भारत में राष्ट्रभाषा की भी हकदार नहीं हो सकी। कहा कि हिन्दीअहिन्दी क्षेत्र को लेकर हरियाणा तो 1966 पंजाब से अलग हो गया। मगर हरियाणा सरकार ने हिन्दी शहीदों का आज तक स्मरण नहीं किया और न ही भाषाई संघर्ष का कोई स्मारक स्थापित किया। जबकि दक्षिण में हिन्दी विरोधी शहीदों की स्मृति में संग्रहालय, पुस्तकालय और न जाने क्याक्या बना दिये गये किन्तु उत्तर भारत में कैसा भी स्मारकीय कार्य नहीं किया गया। यह सब हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान का शोषण नहीं तो और क्या है? कहा कि हिन्दी चिंतन एवं वैकासिक क्रियान्वन की जिन पर जिम्मेदारी बनती है, वे तो ^मुफ्त में रोटी तोड़ो, उपर से नोट मरोड़ो’में मस्त हैं और जो उससे मुक्त हैं, उन्हें हिन्दी की दुर्दशा सोने नहीं दे रही है।
डॉ0 शर्मा ने हिन्दी की अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर खेद प्रकट किया। कहा कि भोपाल के दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में उपेक्षित महामना का हिन्दी सम्मान एवं तत्पश्चात् मारीशस के 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में महात्मा गांधी के दक्षिणी हिन्दी प्रयोग के स्मरण की भूल से भी कोई सबक नहीं लिया गया और विश्व हिन्दी परिषद के बैनर तले वर्ष 2019 में नई दिल्ली के कनॉट प्लेस क्षेत्र स्थित एनडीएमसी सिटी सेन्टर परिसर के सम्मेलन केन्द्र में गांधी केन्द्रित अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में पुनः भूल हो गई। जिसके चलते वर्ष 1919 में महात्मा गांधी की अध्यक्षता में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बंबई अधिवेशन में भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय द्वारा उठाये गये हिन्दी के पहले राष्ट्रवादी हक का स्मरण नहीं किया गया। कहा कि इसी क्रम में फिजी में हिन्दी के राजभाषाई प्रेम का भी खुलासा हो गया और उसके प्रतिनिधित्व में नई दिल्ली में काबिज फिजी दूतावास ने 18 अप्रैली विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन पर सौंपे गये ज्ञापन का जवाब नहीं दिया। कहा कि रही कसर विश्व हिन्दी सचिवालय की थी जो उसने तमाम ऐतिहासिक संभावनाओं के बावजूद भावी विकास कहानी, कविता लेखन में ढूँढ़ना शुरू किया। कहा कि फिजी के रवैये पर बाकी दूतावास भी चलते गये और विश्व हिन्दी पर उठा 18 अप्रैली सवाल अछूता रहता गया।
डॉ0 शर्मा ने मथुरा से हिन्दी आन्दोलन की शुरूआत पर हर्ष व्यक्त किया। कहा कि विश्व हिन्दी समेत राष्ट्रीय हिन्दी आन्दोलन से जयगुरूदेव नाम प्रचारक बाबा तुलसीदास की वह भविष्यवाणी सत्य सिद्ध जान पड़ती है जिसमें उन्होंने हिन्दी के विश्व भाषा बनने का ऐलान किया था।
डॉ0 शर्मा ने खुलासा किया कि विश्व हिन्दी आन्दोलन पर कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की दस्तक से जयगुरूदेव की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई है। कहा कि 10 जुलाई 2020 को सवा घण्टे से भी अधिक समय तक रिकार्ड किये गये इन्टरव्यू में हिन्दी के उन ज्वलन्त प्रश्नों का समाधान किया गया जिन पर अब तक चिंतन नहीं किया गया था। कहा कि प्रश्नों के अलावा विश्वविद्यालय को विश्व हिन्दी आन्दोलन पर वह सामग्री भी प्रदान की गई जो सोशल एवं प्रिंट मीडिया में प्रकाशित की जा चुकी थी।
इससे पूर्व उपस्थितों ने माँ यमुना, भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय समेत राधाचरण गोस्वामी के चित्रपटों पर पुष्पार्चन से कार्यक्रम की शुरूआत की। तत्पश्चात् आयोजन स्थल भारत माता, माँ यमुना के जयकारों एवं ^हिन्दी का होगा तभी विकास याद करोगे जब इतिहास’^राष्ट्रीय हिन्दी दिवस उसे बनायें, इतिहास समर्थित जिसको पायें’नारों से गूंज उठा।
इस अवसर पर विपिन चतुर्वेदी, राकेश चतुर्वेदी, योगेन्द्र, अजय पाठक श्रीकान्त, मुकेश, डी0 एन0 चतुर्वेदी, मोहन चतुर्वेदी आदि उपस्थित थे।


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