गांधी स्मरण पर विश्व हिन्दी का सियासी शंखनाद

अहं की प्रस्थापनाओं में ऐतिहासिक जड़ों से कटते गये हिन्दी संघर्ष की दास्तां पर उस वक्त एक और आघात लगा जब गांधी के उपेक्षित शताब्दिक दक्षिणी प्रयोग से आरोपित मॉरीशस के 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की भूमिका पर प्रायश्चित के बजाय भारत में गांधी स्मरण पर विश्व हिन्दी का सियासी शंखनाद किया गया। यह निष्कर्ष विश्व हिन्दी परिषद के तत्वावधान में नई दिल्ली के कनॉट प्लेस क्षेत्र स्थित एन0डी0एम0सी0 सिटी सेन्टर परिसर के सम्मेलन केन्द्र में 13-14 सितम्बर को आयोजित ‘बहुआयामी गांधीः विविध परिदृश्य’ विषयक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में आमंत्रित डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के समीक्षात्मक अध्ययन से निष्पन्न हुआ। संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में उपेक्षित महात्मा गांधी के शताब्दिक दक्षिणी हिन्दी प्रयोग की मुहिम के सूत्रधार डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि मॉरीशस के 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के चलते उपेक्षित महात्मा गांधी के दक्षिण भारतीय हिन्दी प्रयोग के बरखिलाफ भारत से वैश्विक अभियान की शुरूआत इसलिए की गई थी ताकि भविष्य में हिन्दी के सियासी दुरुपयोग पर लगाम कसी जा सके। मगर अभियान के वर्षपर्यंत भारत समेत विश्व हिन्दी सचिवालय को हिमालयन भूल से अवगत कराना तो दूर रहा बल्कि उल्टे प्रयोजन को सत्ता की खुशामद का जरिया बनाया गया। आगे कहा कि हिन्दी के सियासीकरण के चलते वर्ष 2015 के दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का भी विरोध किया गया था क्योंकि उसे व्यापमं, ललित मोदी विवादों से बाधित संसदीय कार्यवाही एवम् उससे प्रभावित मध्य प्रदेश की भाजपाई शाख उबारने के लिए संस्थान द्वारा प्रेषित महामना स्मारक परियोजना की आधारिक संरचना पर बनारस के बजाय भोपाल में अंजाम दिया गया था। कहा कि अदूरदर्शिता और तात्कालिक स्वार्थपरतावश पूर्व के विश्व हिन्दी सम्मेलनों का भी दुरुपयोग किया जाता रहा होगा। अन्यथा सरकार को विश्व हिन्दी दिवस के लिए 18 अप्रैल 1900 का स्वर्णिम दिवस होने के बावजूद वर्ष 2006 से 1975 की 10 जनवरी और राष्ट्रीय हिन्दी दिवस के लिए 1949 से 14 सितम्बर नहीं चुनना पड़ा होता। कहा कि हिन्दी स्वाधीनता आन्दोलन से लेकर मौजूदा दौर तक निजी हितों में उपयोग की जाती रही है। लिहाजा उसका वैज्ञानिक विकास अवरुद्ध होता गया है। और यह तथ्य इतिहास की नींव में दबा ही रह गया कि 1837 में सरकारी कामकाज से बर्खास्त फारसी के देशज हिन्दी पर हावी होने का प्रथम विरोध भारतीयों ने नहीं बल्कि अंग्रेज विद्वानों ने किया था। काश! महात्मा गांधी को इस तथ्य की जानकारी होती तो वह हिन्दी को फारसी में लिखे जाने की जिद पर 25 जुलाई 1945 को हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्षीय पद से इस्तीफा नहीं देते। डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि मॉरीशस के 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की तर्ज पर विश्व हिन्दी परिषद के तत्वावधान में 13-14 सितबर 2019 को नई दिल्ली में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन के चलते हिन्दी साहित्य सम्मेलन के उस ऐतिहासिक अधिवेशन की उपेक्षा हुई है जिसे 18-19 अप्रैल 1919 को महात्मा गांधी की स्वीकृति से भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में बंबई में आयोजित किया गया था। आगे कहा कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन के बंबई अधिवेशन की ही यह कुव्वत थी कि हिन्दी के राष्ट्रभाषाई अधिकार की 1857 में आचार्य केशव चन्द्र सेन द्वारा उठाई गई माँग को 1919 में बंबई में वैधानिक दर्जा देने पर जोर दिया गया था। कहा कि हिन्दी के ऐतिहासिक विकास में 1919 के बंबई सम्मेलन का महात्मा गांधी के दक्षिणी हिन्दी प्रयोग के बराबर का महत्व था। मगर परिषद ने भारत सरकार की तर्ज पर अज्ञानतावश विश्व हिन्दी पर अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन का नई दिल्ली में आगाज किया।डॉ0 शर्मा ने भारतीय संस्कृति के राजनीतिक दुरुपयोग पर खेद जताया। कहा कि सियासी वजहों से भारतीय देशना वैश्विक स्तर पर अस्तित्वगत मूल्यों की प्रस्थापना में पिछड़ती रही है। अन्यथा भारत आज विश्वगुरू के आसन पर विराजमान होता। आगे कहा कि जागृत मनीषियों ने यद्यपि निजी प्रयत्नों से देश की सीमायें लांघकर उसे विश्ववंद्य बनाया है। फिर भी राजनीति में सम्राट अशोक और अकबर के समान जुझारू हस्तियों के अभाव में उसका वैश्विक असर नहीं हो सका है। कहा कि अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में वाचित प्रधान मंत्री समेत उपराष्ट्रपति के संदेशों में हिन्दी के सांस्कृतिक मूल्यों की राष्ट्रीय प्रस्थापना पर कोई घोषणा नहीं की गई बल्कि प्रस्तुत शोध पत्रों में दक्षिणी हिन्दी प्रयोग की तर्ज पर उत्तर में दक्षिणी भाषाओं पर समान सभा का सवाल उठाया गया। ताकि देश की सभी भाषायें राष्ट्रभाषा की होड़ में लड़ती रहें और देश राष्ट्रत्व से वंचित होता रहे। यह सब भाषाई सियासीकरण नहीं तो और क्या है? डॉ0 शर्मा ने सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में अर्जुनराम मेघवाल, भारी उद्योग एवं लोक उद्यम और संसदीय कार्य राज्य मंत्री; के0 सी0 त्यागी, राष्ट्रीय महासचिव, जनता दल यूनाइटेड; डॉ0 ब्रज बिहारी; प्रो0 विनय भारद्वाज, अध्यक्ष, विश्व हिन्दी परिषद; डॉ0 रश्मि सिंह, सचिव, एन0डी0एम0सी0; प्रो0 कंचन शर्मा समेत प्रो0 मंगला रानी के उद्बोधन में हिन्दी प्रतिबद्धता पर हर्ष जताया। कहा कि सम्मेलन तमाम खामियों के बावजूद परिषद के प्रयासों से अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी समाज को एकजुट करने में जरूर कामयाब हुआ है। जिसका असर इण्डोनेशिया के बाले क्षेत्र में प्रस्तावित सम्मेलन में दिखने की संभावना है। आगे कहा कि यद्यपि दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में सरकार की कारस्तानी पर उठे संसदीय सवाल के मामले में जहानाबाद सांसद डॉ0 अरूण कुमार की छल-छिद्री भूमिका के चलते वर्ष 2018 में परिषद के 10 जनवरीय विश्व हिन्दी दिवसीय आयोजन पर नई दिल्ली के संसद मार्ग क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन किया गया था। फिर भी उचित मार्गदर्शन के अभाव के बावजूद हिन्दी के वैश्विक रूप को संवारने में उसके प्रयासों को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है। कहा कि सम्मेलन जहाँ इन्द्रेश कुमार, सदस्य, अखिल भारतीय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं अध्यक्ष मुस्लिम राष्ट्रीय मंच; मृदुला सिन्हा, प्रथम महिला गवर्नर, गोवा; अनिल श्रीवास्तव, सलाहकार, नीति आयोग; वी0 के0 सिंह, विदेश राज्य मंत्री; अतुल कोठारी, सचिव, शिक्षा-संस्कृति उत्थान न्यास; जितेन्द्र सिंह, संसदीय कार्य राज्य मंत्री; डॉ0 सत्यपाल सिंह, सांसद, बागपत संसदीय क्षेत्र समेत चन्द्रेश्वर प्रसाद ठाकुर, सांसद, राज्य सभा के ओजस्वी वक्तव्यों से जीवन्त बना रहा, वहीं विविध सत्रों में मंजूराय (आगरा); ऋतुराय, शकुन्तला स्वरूपिया, मजिरागुल सेना (श्रीलंका), भावना शुक्ला, रामरूप रोहिणी (मॉरीशस), पुष्पिता अवस्थी (नीदरलैण्ड), डॉ0 मधु भारद्वाज (आगरा), शिलाजी कुमारी, सत्यनारायण (झारखण्ड), सुचेता कृपलानी, श्रुति, अपर्णा पाण्डेय, राधेश्याम शर्मा, संगीता, सावित्री केड़ा (नैनीताल), मनीष शुक्ला, दीपा, कुमाररत्न, रवीन्द्र यादव, शाहिद, प्रो0 चन्दन कुमार, पद्मप्रिया (पाण्डिचेरी), अशोक गगन, अमरनाथ पाठक, डॉ0 बीनाबुदकी, डॉ0 सुमन जैन, संदीप अवस्थी, डॉ0 अर्जुन चौहान, सतीश कनौजिया, प्रो0 गीता सहाय (गया), अनीता शर्मा (जमशेदपुर), डॉ0 उमा सिंह, गोविन्द निर्मल, निशा चौहान (शिमला), डॉ0 प्रिया (केरल), विमला सिवन (हरियाणा), रेखा व्यास, हीरालाल यादव, सौरभ शुक्ला, नगेन्द्र, ओमप्रकाश, प्रो0 भरत सिंह द्वारा गांधी समेत हिन्दी वैविध्य पर प्रस्तुत शोध पत्रों ने अगर कीर्तिमानों को नजरअन्दाज करें तो हिन्दी के विकास की नई संभावनाओं के द्वार जरूर खोले हैं। अगर झलकियों का जिक्र करें तो केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा की ओर से डॉ0 उमापति दीक्षित द्वारा शिवताण्डव स्तोत्र की भावपूर्ण प्रस्तुति, बिहार चंचिली मैथिली ठाकुर द्वारा प्रस्तुत भजनांजलि पश्चात् शुभांगी मिश्रा ने शास्त्रीय नृत्य समेत अन्यान्य प्रस्तुतियों से दर्शकों को भक्तिरस में डुबो दिया। अगले क्रम में अदिति महाविद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत आलोचनात्मक नाटिका ‘अपने-अपने’ गांधी उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद विषयवस्तु के अप्रासंगिक चयन के चलते दर्शकों पर गहरा प्रभाव नहीं छोड़ सकी और उसके ‘सबके संगी महात्मा गांधी’ होने का अभाव अखरता रहा। इससे पूर्व कवि सम्मेलन में पूनम आनन्द द्वारा दफा 370 पर काव्य प्रस्तुति ने वाह-वाही लूटी। तत्पश्चात् वी0 पी0 सिंह, उपनिदेशक राजभाषा ने वक्तव्य में हिन्दी चिंतन पर जोर दिया। समापन पर आयोजन के सहयोगियों में गोविन्द निर्मल, एम0 चितैया, निदेशक, उद्यान, एन0डी0एम0सी0; राहुल गौतम, उम्मेद सिंह नेगी, रवीन्द्रनाथ भारती, अनीता जोशी, सुनीता बोहाडि़या, मधु भारद्वाज, सोनू अन्नपूर्णा, वीरेन्द्र कुमार दत्ता, नागेन्द्र नारायण, देवराज पोखरियाल, शकुन्तला सोरटिया, तकम सानिया का सम्मान किया गया।प्रतिभागियों में डॉ0 आदित्य कुमार गुप्ता, डॉ0 रामावतार मेघवाल, विशाल आर्यावर्त, गोविन्द कुमार सिरोही (गांवों का संगी), ब्रज किशोर सिंह, सौरभ कुमार सुमन, डॉ0 ममता पाठक ने विशिष्ट उपस्थिति से सम्मेलन को गौरवान्वित किया। संचालन प्रो0 माला मिश्रा एवं धन्यवाद ज्ञापन विश्व हिन्दी परिषद] महासचिव] डॉ0 बिपिन कुमार ने किया।

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