ग्राउज उपेक्षक दीनदयाल धाम रेलवे पर कलंक


 



145वें रेल संचालन दिवस पर जंक्शन क्षेत्र में आयोजन

मथुरा,

      महात्मा गांधी की निर्मम हत्या की भरपाई में पण्डित दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमयी मौत का कलंक कांग्रेस के मत्थे मढ़ने के फेर में भाजपा माना कि अरबों रूपये बरबाद करने के बावजूद कुछ भी हासिल कर सकी हो। मगर आधुनिक मथुरा के निर्माता, मथुरा संग्रहालय संस्थापक, मन्दिर—मस्जिदों के जीर्णोद्धारक एवं मथुरा में प्रथम रेल संचालन के जनक फ्रेडरिक सिल्वन ग्राउज के रेल योगदान की उपेक्षा से कलंकित जरूर हो गई।



यह आरोप मथुरा—हाथरस के बीच प्रथम रेल संचालन की 145वीं वर्षगांठ पर 19 अक्टूबर सोमवार को जंक्शन रेलवे स्टेशन क्षेत्र में आयोजित जनजागरण अभियान में लगाया गया।

संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं ग्राउज स्मारक रेल संग्रहालय के सूत्रधार डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप दोहराया कि भाजपा सरकार ने ग्राउज स्मारक रेल संग्रहालय पर उस वक्त कान में सीसा, आँख पर पट्टी और जुबाँ पर ताला लगाया है, जब वर्ष 2015 में परियोजना को लेकर सौंपे गये ज्ञापन पर तत्कालीन रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने पहल की। तत्पश्चात् हरकत में आये  विरासत के कार्यकारी निदेशक मनु गोयल जंक्शन क्षेत्र के सीनियर सेक्शन इन्जीनियर 0 के0 गौतम द्वारा प्रस्तुत परियोजना पर विभागीय औपचारिकता निभाकर मुचकुन्दी निद्रा में सो गये। आगे कहा कि ग्राउज स्मारक रेल संग्रहालय पर माननीय प्रधान मंत्री का दरवाजा खटखटाने पर डीएमई एस0 एस0 पाराशर के साथ बैठक में परियोजना पर पुनः मंथन किया गया। मगर उसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। कहा कि रेल संग्रहालय उस महान प्रशासक की उपेक्षा पर उतारू है जिसने मथुरा में रेल संचालन के लिए केवल प्रशासकीय प्रयास किये बल्कि जरूरत पड़ने पर सेठ लखमीचन्द के डेढ़ लाख रूपये के आर्थिक सहयोग के बाद स्वयं एक लाख रूपया दांव पर लगाया था। मगर किसे पता था कि रेल से जीने—मरने की याद में स्टेशन के स्टेशन दीनदयाल के नाम चढ़ जायेंगे और भारत में स्वाधीनता की अलख जगाने की खातिर मथुरा में रेल का सपना साकार करनेवाले भारतमाता के पाश्चात्य पुत्र को रेल संचालन के 145 साल बाद भी याद नहीं किया जायेगा।

डॉ0 शर्मा ने खुलासा किया कि कलकत्ता में चलनेवाली पहली रेल शिपिंग की गलती के चलते 1853 में बंबई में चलने के पूर्व पूरे देश में रेल विस्तार शुरू हो चुका था। मगर इसी बीच 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों को संयुक्त प्रान्त के पश्चिमी प्रदेशों के विद्रोह ने बेरूख कर दिया। नतीजन प्रयाग सूबे का केन्द्र हो गया और आगरा से शिक्षा समेत न्यायिक सेवाओं के केन्द्र छीन लिये गये। आगे कहा कि 1868 में एफ0 एस0 ग्राउज के मथुरा में ज्वाइन्ट मजिस्ट्रेट नियुक्त होने पर रेल संपर्क का रास्ता ढूँढ़ा गया जिसकी लागत में आनेवाले कुल व्यय के दो—तिहाई हिस्से पर सरकार मुश्किल से राजी हो सकी थी। कहा कि ग्राउज ने आनुदानिक चुनौती को भी स्वीकार किया और मीटर गेज रेलवे लाइन बिछाने की कुल लागत 9]55]688 रूपये के लिए 3]24]100 रूपये स्थानीय सहयोग से इकट्ठे किये गये थे। तब जाकर कहीं 30]000 रूपये प्रति मील की दर से साढ़े उनतीस मील लम्बी मीटर गेज लाइन पर 19 अक्टूबर 1875 के दिन रेल दौड़ सकी थी और मथुरा पहली बार ईस्ट इण्डिया लाइन जुड़ सका था। उस नजारे को देखने के लिए लाखों लोग मथुरा—हाथरस के बीच रेलवे लाइन के दोनों किनारों पर इकट्ठे हुए थे। कहा कि दुर्भाग्य से सांसद हेमामालिनी को रेल विरासत की जानकारी नहीं दी गई या फिर उन्होंने स्वयं उसमें रूचि नहीं ली। वरना कम—से—कम उनकी देखरेख में विकसित कैण्ट स्टेशन ग्राउज के नाम हो गया होता और उसी के साथ रेल संग्रहालय ईजाद हो गया होता। कहा कि यह भी कम दिलचस्प वाकिया नहीं है कि उसी वर्ष सरदार वल्लभभाई पटेल 11 दिनों बाद गुजरात के खेड़ा जिले के अन्तर्गत नडियाड क्षेत्र में पैदा हो गये और उनका हिन्दुत्व सारे जहाँ में फैलाया गया। मगर ग्राउज उससे पूर्व जिस हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान के लिए मरते रहे, उसे 150 वर्षों बाद भी सम्मान नहीं दिया गया। कहा कि भाजपा आज जिस हिन्दुत्वोद्धार पर नाच रही है। उसका सपना पहले—पहल ग्राउज ने ही देखा था और उन्होंने उसे भारत में कांग्रेस के पैदा होने से पहले 1882 में श्रीरामचरितमानस का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित करके जता भी दिया था। कहा कि ग्राउज ही वह पहले स्वप्नदृष्टा थे जिन्होंने भारत का भविष्य श्रीरामचरितमानस में देखा था और उसके लिए उन्होंने मानस की चौपाईयों को प्राथमिक शिक्षा में लागू कराने की पेशकश की थी। कहा कि बंबई के बाद दिल्ली में बहुत जल्द रेल चली क्योंकि 1857 के बाद कलकत्ता से दिल्ली राजधानी परिवर्तन का रास्ता जरूरी जो हो गया था। कहा कि रेल  विरासत के उसी ऐतिहासिक महत्व के नजरिये भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीवगांधी ने भारत में पहली बुलट ट्रेन का सपना कलकत्ता से दिल्ली के बीच देखा था। मगर गुजरातवाद की क्या कहें उसने भारत के रेल विस्तार का ऐतिहासिक महत्व भी छीन लिया और मौजूदा प्रस्तावित ट्रेन बंबई से अहमदाबाद स्थानान्तरित हो गई। कहा कि नोटबंदी पर भी गुजरातवाद हावी रहा और नये नोटों के अंक गुजराती में छापे गये। कहा कि ग्राउज का हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान के अभ्युदय में अपने जमाने का सवोंत्कृष्ट योगदान था जिसकी प्रशंसा में भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय को उत्तर प्रदेश में हिन्दी को सरकारी कामकाज का दर्जा दिलाने में उनका ऋणी होना पड़ा था। फिर भी प्रधान मंत्री स्वार्थी और शरारती तत्वों के हाथों खेल रहे हैं जिसको लेकर भावी इतिहास में उनके प्रयोगों की निन्दा हुए बगैर नहीं रहेगी।





समापन पर डॉ0 शर्मा ने बताया कि आयोजन के लिए पहले कैण्ट स्टेशन पर प्रयास किया गया किन्तु स्टेशन को सील पाने पर कैण्ट क्षेत्र में आयोजन करना पड़ा। इस बीच दिलचस्प वाकिया यह रहा कि लौटते—लौटते रेलवे सुरक्षा बल के लोगों को आयोजन का प्रयोजन जानने में रूचि हुई। फलतः उन्हें समझाया गया। किन्तु जब जानकारी कोरोनाशाही में तब्दील हुई तो गर्माहट में उन्हें सरकारी प्रयत्नों की भी जानकारी दी गई जिसको सुनकर उनका कोरोना बुखार उतर गया। 

इससे पूर्व उपस्थितों ने एफ0 एस0 ग्राउज समेत सेठ लखमीचन्द के चित्रपटों पर पुष्पार्चन से आयोजन की शुरूआत की। तत्पश्चात आयोजन स्थल भारत माता के जयकारों एवं ^जब तक सूरज चाँद रहेंगे, ग्राउज—लखमीचन्द के नाम रहेंगे^रेल दिवस जिन्दाबादनारों से गूँज उठा।

इस अवसर पर विकास सिंह, प्रभुदयाल, मुकेश सिंह, नवल सिंह, मेघश्याम लक्ष्मण, प्रहलाद, वारिस, जितेन्द्र सिंह, बलबीर सिंह, नानकचन्द, बन्टी उपस्थित थे।         

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