भूजल बचाओ आन्दोलन से राष्ट्ररक्षक सप्ताह की शुरूआत
मथुरा,
अयोध्या का मन्दिरमस्जिद विवाद भले ही वर्ग विशेष की विजय का प्रतीक साबित किया जा रहा हो। मगर सूबे के जल संकट ने उसे प्राकृतिक पराजय के कुएं में ढकेल दिया है।
यह खुलासा भूजल बचाओ आन्दोलन की पाँचवीं वर्षगांठ पर राष्ट्ररक्षक सप्ताह के शुरूआती दिन रविवार को डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में विश्रामघाट क्षेत्र में आयोजित कार्यक्रम में किया गया। संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं भूजल बचाओ आन्दोलन समेत राष्ट्ररक्षक सप्ताह के सूत्रधार डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में सत्ता की खातिर मन्दिरमस्जिद की अफीमी हवा में ऐशोआराम का मुकाम तो ढूँढ़ लिया गया। मगर अमेरिकन वैज्ञानिकों के उस सर्वेक्षण का प्रचारप्रसार नहीं होने दिया गया जिसमें उन्होंने मन्दिरमस्जिद विवादोत्पत्ति के दौरान तीस साल पहले सूबे के जल में बहाये जा रहे जहरीले आर्सेनिक रसायन से सरकार को सावधान किया था। आगे कहा कि मन्दिरमस्जिद की आड़ में सत्ता समेत सूबे के पूँजीपतियों ने महज आर्थिक लाभ की खातिर धरती का अनमोल रत्न जलधन संदूषित होने दिया और गरीबों का जल से अधिकार उठ गया क्योंकि शुद्ध भूजल के लिए आर0 ओ0 जरूरी होता गया। कहा कि सूबे की गरीबी का फायदा उठाते हुए भावनात्मक मुद्दे हवा में फैलाये गये जिसके शिकार निर्दोषों के नृशंस नरसंहार की याद में कोई स्मारक नहीं खड़ा किया गया। कहा कि सूबे की असली समस्या गरीबी रही है और पूँजीपति निजी स्वार्थों के चलते उसे मिटने नहीं दे रहे हैं जिसकी परिणति छद्म धर्माेन्माद
है जो अमीरों को अमीर और गरीबों को गरीब बनाता जा रहा है।
डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि प्राकृतिक संसाधनों के संदूषण के चलते बढ़ती आर्थिक जरूरतें समाज में फासला बढ़ाती जा रही हैं और उनकी प्रतिक्रियाओं के बचाव में धार्मिक मुद्दों का सहारा लिया जा रहा है ताकि अमीरों के कवच गरीब उनकी हिफाजत करते रहें। आगे कहा कि सूबे में प्राचीनकाल से दबंगों का वर्चस्व रहा है जो आमआदमी को उपर उठने से रोकते रहे हैं। यही स्थिति लगभग सभी हिन्दी भाषी प्रान्तों की रही है जिसके चलते आजादी से पूर्व भारत को विभाजित होना पड़ा। कहा कि आजादी के दौर में राजनीतिकधार्मिक कारणों से बड़ा आर्थिक विषमता का कारण था जिसने विभाजन के साथ आरक्षण का स्वरूप धारण कर लिया। कहा कि दबंगों के वर्चस्व के चलते मापदण्डों पर तय विभाजन समेत आरक्षण खरा नहीं उतरा और विभाजितअविभाजित भारत के दुर्बल वहीं के वहीं रहते रहे। कहा कि नई व्यवस्थाओं में यही दबंग विधायिकाओं पर काबिज होते गये और प्रजातंत्र की न्यायपालिका समेत कार्यपालिका पर उन्हीं का कब्जा बढ़ता गया। नतीजन नये मुल्कों के संविधान कोरे कागज बनते गये और वोट बैंक के लालच में दस वर्ष के लिए निर्धारित आरक्षण 73 सालों तक दुर्बलों का शोषण करता रहा।
डॉ0 शर्मा ने क्षोभ जताया कि नदियों के सीवरवाहिनी बन जाने के बावजूद धरा में आरक्षित अस्सी प्रतिशत भूजल के संरक्षण एवं संवर्द्धन के उपाय भारत ही क्या पूरे विश्व में नहीं किये जा रहे हैं। नतीजन संपूर्ण विश्व भूजल संदूषण से ग्रसित होता जा रहा है।। आगे कहा कि मथुरावृन्दावन के बीच यमुना पुलिन मीठे शुद्ध पेयजल के अकूत भण्डारों पर आबाद नई बस्तियों ने कहर बरपाना शुरू किया और बसावट के कुछ ही वर्षों में इलाकों का भूजल सीवरवाहिनी नदियों जैसा बन गया। कहा कि मथुरा में भूजल संदूषण के बाबत स्थानीय प्रशासन समेत जल संसाधन मंत्रालय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत से शिकायत के बावजूद कानों पर जूं नहीं रेंगी और मामला एक दूसरे के कन्धे पर लटकाया जाता रहा। कहा कि नई दिल्ली में नेहरू मेमोरियल म्युजियम एण्ड लाइब्रेरी में मंत्रालय के जल संरक्षण केन्द्रित आयोजन में सचिव जल संसाधन राज्य मंत्री रतनलाल कटारिया और सचिव यू0 पी0 सिंह शिकायत पर मामले को स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी बताया। मगर जमीनों के मूल्य पर आर्थिक लाभ के मद्देनजर एनजीटी समेत सर्वोच्च न्यायालय बेहद सक्रिय रहे और करोड़ों वर्षों में बना भूजल भण्डारण गफलत में संदूषित होता रहा।
इससे पूर्व उपस्थितों ने माँ यमुना के चित्र पट पर पुष्पार्चन से आयोजन की शुरूआत की। तत्पश्चात् आयोजन स्थल भारत माता, मां यमुना के जयकारों एवं ^भूजल रहरह करे पुकार मत छीनों जीवन का हार’ नारे से गूँज उठा। इस अवसर पर विपिन चतुर्वेदी, मंसोला चतुर्वेदी, राजकुमार, संतोष चतुर्वेदी उपस्थित थे।


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