सवाई जयसिंह के विश्वगुरूत्व पर सजदा करेगी दुनिया- डॉ0 शर्मा

 



332वें जन्मदिवस पर मथुरा में संकल्प

नवअभियान के साथ जयसिंहपुरा के 300वें स्थापनावर्ष का समापन

मथुरा,

      यूनान के वर्चस्व ने माना कि तेईस सौ साल पहले सारे जहाँ को जुल्मो-सितम से झुका दिया था। मगर तीन सौ सालों से रोशन सवाई जयसिंह का विश्वगुरूत्व अब दुनिया से भारत का सजदा करवायेगा।

इस भवतव्यता पर जयसिंहपुरा स्थापनावर्ष के उपलक्ष्य में सवाई जयसिंह के जन्मदिवस 3 नवम्बर को डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में गणेशधाम कॉलोनी स्थित संस्थान परिसर में आयोजित ‘सवाई जयसिंह बनाम जयसिंहपुरा’ खुला मंच में मंथन किया गया।



सवाई जयसिंह के जन्मादिवस पर आयोजित खुलामंच में उपस्थित प्रतिभागी


संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं धरोहर बचाओ आन्दोलन के तहत सवाई जयसिंह स्मृतियों के पुनर्खाेजी सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि वैदिक ज्ञान में सवाई जयसिंह के वैश्विक योगदान पर आज विश्व नतमस्तक है। मगर भारत में  मायावादियों को हिन्दुत्व का जामा पहनाया जा रहा है। आगे कहा कि यदि भारत सवाई जयसिंह के समय से सजग रहा होता और उनके द्वारा स्थापित वेधशालाओं को वैज्ञानिक सोपानों से विकसित किया गया होता तो नासा आज अमेरिका के बजाय भारत में स्थापित हुआ होता। कहा कि स्पेन प्रीमियर द्वारा मथुरा में सवाई जयसिंह पर आयोजित कार्यक्रम की पसन्दगी विश्वविख्यात विभूति का गौरव बयाँ कर रही है और भारत में कान फूँकने के बावजूद अदाकारा सांसद समेत क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों एवं केन्द्र व राज्य सरकारों पर जूँ तक नहीं रेंगी। कहा कि ईंट-पत्थरों के संघर्ष में उलझा राष्ट्रवाद धार्मिक मौलिकता के विध्वंश पर कभी स्थायित्व हासिल नहीं कर सकेगा। कहा कि धार्मिक   मुद्दे सिर्फ उस सत्य की परछाईयां हैं जो अलग-अलग समय पर उद्घाटित होती रही हैं।

डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि अब्दुल नबी के हाथों आधुनिक मथुरा की बसावट को सवाई जयसिंह ने स्थापत्य से सजाया और संवारा था। मगर माया की हवस को क्या कहें कि आज सवाई जयसिंह के स्मरण को दो गज जमीन भी नसीब नहीं है। आगे कहा कि सवाई जयसिंह के महापरिनिर्वाण के साथ ही जयसिंहपुरा के दुर्दिन छा गये और लोगबाग उनके द्वारा विनिर्मित इमारतों की ईंटे खोद ले गये। कहा कि राजपूत सत्ता के अवसान काल में ही कभी अवागढ़ और मुरसान राजवंशों ने सवाई जयसिंह द्वारा आबाद इलाके में आवास बनाये। तदुपरान्त दूधाधारी सन्त ने जयसिंह महल को अपना आवास बनाया । तत्पश्चात् सम्पत्ति 1857 के दौर में जमादार दिलावर खां के नाम इसलिए घोषित हो गई क्योंकि उसने विद्रोह के दौरान तत्कालीन कलेक्टर मार्क थार्नहिल को मथुरा से सुरक्षित आगरा पहुँचाने में मदद की थी। मौजूदा मुस्लिम बसावट समेत कब्रिस्तान दिलावर खां की देन है। कहा कि समय ने इलाके में एक करवट फिर ली और 20वीं सदी के परार्द्ध में गायत्री तपोभूमि समेत आकाशवाणी ने यमुना-सरस्वती संगम तट पर अपने पैर जमाये।

डॉ शर्मा ने आक्रोश जताया कि कहा कि कला-संस्कृति को समर्पित इन्दिरा गांधी नेशनल सेन्टर फॉर आर्ट्स और कोलम्बिया विश्वविद्यालय की शोध परियोजनाओं ने सवाई जयसिंह के कृतित्व का दोहन और शोषण तो कर लिया किन्तु उनके स्मारक चिह्नों के संरक्षण का प्रयास नहीं किया। कहा कि इन्दिरा गांधी नेशनल सेन्टर फॉर आर्ट्स से पूर्व इन्डियन नेशनल ट्रस्ट फॉर कन्जर्वेशन ऑफ कल्चरल प्रापर्टी (इन्टैक) ने स्मारक संरक्षण पर बड़ा तूफान मचाया और उसके लिए  ब्रजभूमि चेप्टर की स्थापना जयसिंहपुरा स्थित मौजूदा सरस्वती अस्पताल के नाम से विख्यात सेठ मांगेलाल के बगीचे में की। मगर प्रकल्प समेत समस्त संकल्प ढाक के तीन पात सिद्ध हुए और सवाई जयसिंह का स्मरण अछूता रह गया। कहा कि स्वयं जयसिंहपुरा स्थित गायत्री तपोभूमि एवं मथुरा आकाशवाणी अपने-अपने  स्थापना की स्वर्ण जयन्ती मनाकर डायमण्ड में प्रवेश कर गये। मगर संस्कृतिवाहिनी संस्थायें होने के बावजूद उन्हें जयसिंहपुरा के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ख्याल नहीं आया। कहा कि गायत्री तपोभूमि का सांस्कृतिक नजरिया तो सबसे अद्भुत रहा और उसने संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा के वे सारे अवशेष ढहा दिये जो संस्था के उद्भव और विकास के गवाह थे। फिर पता नहीं संस्था सांस्कृतिक परीक्षाओं से क्या सन्देश दे रही है? कहा कि अब हालात तो ये  गये कि जमीनों के बढ़ते दामों ने सवाई जयसिंह की क्षेत्र स्थित समस्त स्मृतियों को नेस्तनाबूत कर दिया और उस पर राधे बाबा की भावी आवासीय परियोजना, श्रीचन्द विद्या आश्रम स्कूल, गोशाला वगैरह न जाने कितने प्रकल्प स्थापित हो गये। मगर सवाई जयसिंह पर किसी को रहम नहीं आया बल्कि जानकारी के बावजूद उन्हें पुण्यतिथि व जन्मदिवस पर उचित सम्मान नहीं दिया गया।

डॉ0 शर्मा ने क्षेत्रीय संस्थाओं की अकर्मण्यता पर क्षोभ जताया। कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण के मद्देनजर कलेक्टर एफ0 एस0 ग्राउज ने 1874 में संग्रहालय की स्थापना की थी किन्तु आज संस्था सिवाय टीए, डीए, फण्ड, बोनस, ग्रेच्युटी, प्रोमोशन और पेन्शन से हटकर सोचने में अक्षम है। जिसके चलते डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा द्वारा स्थापित प्रथम निदेशक का गौरव 50 सालों से भी कम अन्तराल में पदावनत होकर उप निदेशक पर सिमट गया और उसका अपयश दूसरों के वीजन से लाभ उठाने में माहिर डॉ0 एस0 पी0 सिंह को लगा।  कहा कि 20वीं सदी के विरासत चिंतकों के चिंतन से पैदा नये शोध एवं सांस्कृतिक केन्द्र रोटी तोड़क मण्डल बनते गये और उन पर मायावादी हावी होते गये। परिणामस्वरूप समाज और सरकारी अनुदान से सिंचित संस्थायें त्याग और समर्पण के बजाय मस्ती प्वाइन्ट बनते गये। और उनसे राष्ट्रोत्थान का संकल्प तो दूर स्थापना क्षेत्र का स्वप्न भी साकार नहीं किया जा सका।

डॉ0 शर्मा ने क्षोभ जताया कि स्थापना से चिरनिद्रा में लीन पुरातत्व ब्रज में नये स्मारकों का अधिग्रहण नहीं कर सका। नतीजन सांस्कृतिक महत्व के कई स्मारक निजी सम्पत्तियों में दर्ज हो गये। आगे कहा कि यह तो ग्राउज साहब का प्रयास था कि गोविन्ददेव  मन्दिर बलात् विध्वंश से बच गया वरना उसका उसका भी बाकी स्मारकों जैसा दुःखद हश्र हुआ होता। कहा कि ग्राउज के सौ साल बाद जर्मनी के सौजन्य से प्रो0 हर्टल और डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा के निर्देशन में विश्व प्रसिद्ध सोंख टीले का पुरातात्विक उत्खनन किया गया। मगर उसके बाद 50 वर्षों तक भारतीय पुरातत्व ने कोई कदम नहीं उठाया और गोसना जैसे अति महत्वपूर्ण टीलों को जुबां नहीं मिल सकी। कहा कि क्षेत्र के तमाम पूर्व एवं मौजूदा मंत्रियों के बावजूद ब्रज का सांस्कृतिक पतन विधायिका की विकृत कार्यप्रणाली का हिस्सा है और उसी के चलते प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 2013 के संशोधन से उनके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। कहा कि उसी प्रभाव में विकसित नगर निगम अरबों  रूपये के बजट के बावजूद सांस्कृतिक उत्थान में कोई योगदान नहीं दे सका। उसी के पदचिह्नों पर जिला पंचायत भी चलती गई। अगर जिला प्रशासन की बात करें तो जनप्रतिनिधित्व की तर्ज पर जिला कई दशकों से योग्य प्रशासकों से वंचित रहा। लिहाजा सांस्कृतिक उत्थान पर कोई बहस नहीं छिड़ सकी। कहा कि यह पूर्व से चलती आई मायावादी परम्परा का दुष्परिणाम है कि आज भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय एवम् एकात्मवादी राष्ट्रचिंतक दीनदयाल उपाध्याय की स्मृतियों को जड़ समेत उखाड़ फेंका गया। और तो और जिस कलेक्ट्रेट में एफ0 एस0 ग्राउज जैसे मनीषियों ने ब्रजोद्धार किया, मूर्खों ने संरक्षण के बहाने अतिरिक्त लाभार्जन की खातिर उसे ही ढहा दिया। मजे की बात तो यह हुई कि कुषाणयुगीन सांस्कृतिक राजधानी में कुकुरमुत्तों जैसी संस्थाओं ने विध्वंश को रोकना मुनासिब नहीं समझा। कहा कि कलि-कल्मष के प्रचार-प्रसार से अरबों का व्यापार कमाती मैटर मैनीपुलेटिंग बराय नाम दबंग पोषी दुर्बल शोषी मीडिया को विरासत का चीरहरण दिखाई नहीं दिया।

डॉ0 शर्मा ने खुलासा किया कि महामना को भारतरत्न दिलाने के बाद संस्थान ने उनकी ब्रजस्थ स्मृतियों के प्रचार-प्रसार को टीवी वृत्तचित्र की मांग की किन्तु परियोजना पर प्रधान मंत्री समेत स्थानीय दूरदर्शन मौन साध गये। जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि शताब्दिक कगार छूती महामना स्मृतियां विध्वंश की शिकार हो गई।            

 

डॉ0 शर्मा ने सवाल उठाया कि मराठों में छत्रपति शिवाजी क्यों सिरमौर बने और उनसे ज्यादा प्रखर हस्तियां समाज पर उतना गहरा असर नहीं डाल सकी? आगे कहा कि महाराष्ट्र में आज भी ‘जानता राजा’ नाटक की धूम मचती है और ब्रज में गजनवी के मुकाबले कुलचन्द, औरंगजेब के मुकाबले गोकुला एवं ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ  अख्तियार खां को पहचाना तक नहीं गया। कहा कि मौजूदा ब्रज संस्कृति पूर्व संस्कृतियों का प्रक्षेप है। वरना यह बिलकुल संभव नहीं है कि मथुरा का अस्तित्व हजारों-हजार साल से रहा और वृन्दावन महज 10 किमी दूरी के बावजूद चैतन्य महाप्रभु द्वारा खोजा गया। कहा कि यदि हड्डियों की हुण्डियों में तब्दीली से पूर्व वृन्दावन शोध संस्थान के सर्वेक्षण कार्य की मानें तो मदनमोहन मन्दिर परिसर से प्राप्त गुप्तकालीन अभिलिखित ईंट उस स्थान पर सूर्य मन्दिर होने का संकेत देती है। उससे पूर्व यह क्षेत्र बौद्ध उपासना केन्द्र रहा हो सकता है। कारण कि मुडि़या पूनम सनातन गोस्वामी के निर्वाण समेत भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण की भी साक्षी है जहां उन्होंने मौजूदा गोवर्द्धन नाम से विख्यात रूरूमुण्ड पर्वत पर आनन्द से अपने पूर्व एवं भावी जन्मों का रहस्योद्घाटन किया था। कहा कि दुर्भाग्य से नई दिल्ली स्थित इन्दिरा गांधी नेशनल सेन्टर फॉर आर्ट्स ने पिछले दशक ब्रज संस्कृति पर बड़ा हुल्लड़ मचाया किन्तु वृन्दावन की चैतन्यपर्यन्त संभावनाओं पर किसी को मुंह खोलने का साहस नहीं हुआ। कहा कि उड़ीसा के पुरी क्षेत्र स्थित जगन्नाथ मन्दिर की पूजन पद्धति में आज भी बौद्ध परम्परा के लक्षण विद्यमान हैं और चैतन्य वृन्दावन खोजने के पश्चात् पुरी ही गये थे। जहाँ उनकी भावावेश में सामुद्रिक दुर्घटना से मृत्यु हुई। कहा कि मौजूदा समय भी तमाम प्रचार-प्रसार के बावजूद राष्ट्रीय इतिहास से जुड़ी स्थानीय हलचलों के साक्ष्य मिटते जा रहे हैं। मसलन सौ साल पहले स्थापित जिला अस्पताल संस्थापक गोवर्द्धन लाल जत्रा को ही लोगबाग भूल गये। यहां तक कि विरासत पर पुरस्कार लपकुओं को भी उनका पता नहीं। कहा कि ऐसे ही गांधी पार्क, हालनगंज, मसानी एवं धौरेरा के पुल, वृन्दावन का सी0 एफ0 सी0 चौराहा ऐतिहासिकता खोते जा रहे हैं। फिर वृन्दावन का अतीत भला कैसे सुरक्षित रहा होगा? बेहोशी ने ऐसे हालात पैदा कर दिये कि महात्मा गांधी से जुड़ी राष्ट्रीय घटनाओं के स्थानीय साक्ष्यों तक की लोगों को परवाह नहीं रही। बस ब्रज संस्कृति का राग अलापते जा रहे हैं।

इससे पूर्व उपस्थितों ने भारत माता समेत सवाई जयसिंह के जयकारों से आयोजन की शुरूआत की। तत्पश्चात् आयोजन स्थल ‘जब तक सूरज चाँद रहेगा, सवाई जयसिंह का नाम रहेगा’ ‘सवाई जयसिंह अमर रहें’ नारों से गूँज उठा।

इस अवसर पर कन्हैयालाल, छोटेलाल, शकील, गणेशीलाल, जयपाल सिंह, जितेन्द्र कुमार कर्दम, महेन्द्र, कैलाश वर्मा, गौरव, राकेश कुमार जगदीश उपस्थित थे।   

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