मुख्यमंत्री वापस लें यमुनाघाती बयान - डॉ0 शर्मा

 



कुम्भ पूर्व भाषण पर उठा सवाल

मथुरा,

              35 सालों में 70 हजार करोड़ रूपये की बरबादी के बावजूद मैली की मैली गंगा-यमुना के भविष्य पर उस वक्त एक विपरीत प्रभावकारी आघात और चस्पा हो गया, जब सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने वृन्दावन कुम्भ से पूर्व सरकारी योजनाओं के उद्घाटन पर 14 फरवरी को प्रायोजित कार्यक्रम में यमुना की दुर्गति के लिए दिल्ली सरकार को दोषी ठहराया।

मुख्यमंत्री के दुर्भाग्यपूर्ण बयान के बरखिलाफ डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में 16 फरवरी को गणेशधाम कॉलोनी क्षेत्र में उग्रतपा चिंमभ कुटी स्थित परिसर में प्रतिवाद किया गया।

संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं यमुना मुक्ति समेत नदियां छोड़ो सीवर जोड़ो आन्दोलन प्रवर्तक डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने प्रत्यारोप लगाया कि सूबे के मुखिया ने यमुना दुर्दशा के लिए दिल्ली सरकार को दोषी ठहराकर उस सवाल को सत्य साबित किया है जिसे संस्थान द्वारा वर्ष 2015 में नमामि गंगे पर सरकारी मंशा को लेकर उठाया गया था। आगे कहा कि संस्थान द्वारा नमामि गंगे पर उठाये सवाल के जवाब में सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट किया था कि 29 वर्षों में गंगा इसलिए शुद्ध नहीं हो सकी क्योंकि परियोजना अलग-अलग राज्यों द्वारा क्रियान्वित की गई थी। और नमामि गंगे के बीस हजार करोड़ रूपये से यमुना इसलिए स्वच्छ हो जायेगी क्योंकि परियोजना सीधे केन्द्र सरकार द्वारा कार्यान्वित की जायेगी और उसके लिए अलग मंत्रालय गठित किया गया है। कहा कि फिर मुख्यमंत्री ने वृन्दावन कुम्भ पूर्व भाषण में यमुना की दुर्दशा पर दिल्ली सरकार को क्यों दोषी ठहराया?   



डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि 35 करोड़ रूपये की लागत से सजे कुम्भ मेले की महत्ता पर प्रकाश तो बहुत डाला गया किन्तु निर्धारित तिथियों पर अमृत स्नान का वायदा वक्ताओं में से किसी ने नहीं किया। आगे कहा कि छैला विधायक से लेकर अदाकारा सांसद तक ने आयोजन में सरकारी सहयोग की भूरि-भूरि प्रशंसा की। मगर मल-मूत्र में मोक्षदायी स्नान पर सभी मौन साध गये। कहा कि मायावादी चकाचौंध में दम तोड़ते धर्म की उपेक्षा से साफ है कि विश्व विकास के नाम पर विनाश की ओर ढकेला जा रहा है। कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा उद्घाटित 413 करोड़ रूपये की परियोजनायें उन नौकरशाहों और तथाकथित दबंगों की मनगढंत उपज हैं जिसका भ्रष्टाचारी लाभ वही उठायेंगे। कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण के नाम पर विध्वंशित 1857 के पश्चात् का कलेक्ट्रेट साफ बयां कर रहा है कि सांस्कृतिक विध्वंश किन हदों को पार कर चुका है? और उसके संरक्षण के लिए तीर्थ विकास परिषद गठित किये जा रहे है। कहा कि परिषद ऐसे लोगों से भरी है जिन्हें धन उगाही के अलावा और कुछ आता ही नहीं है।

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