गफलत ने बिसराया वृन्दावन कुंभ का मूल -डॉ0 शर्मा

 






भागवत में खोया वृन्दावनी कुंभी माहात्म्य

सूने रह गये कालीदह के तट

अप्रासंगिक सांस्कृतिक प्रदर्शन पर रोष

त्रैवार्षिक आयोजन पर जोर

मथुरा,

          35 करोड़ रूपये की लागत से 37 दिनों तक चले वृन्दावन कुंभ मेले ने माना कि सरकारी प्रयासों को राजनीतिक मकसदों में तब्दील करने में खासी कामयाबी हासिल की है। मगर सदियों से उपेक्षित वृन्दावन का कुंभी माहात्म्य सरकारी प्रयासों के बावजूद गफलत में बिसराया जाता रहा।





धार्मिक प्रयोजन की सांस्कृतिक असफलता पर डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में वृन्दावन कुंभ बैठक के समापन दिवस 25 मार्च को गणेशधाम कॉलोनी स्थित चिंमभ कुटी प्रांगण  में मंथन किया गया।



संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं वृन्दावन कुंभ माहात्म्य अन्वेषक डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि माता वनिता की दासता के दुःख से पीडि़त गरूड़ ने समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश को वृन्दावन लाकर उदात्त कर्तव्य का निर्वाह किया था। किन्तु उसके स्मरण में मायावादी तत्परता ने पौराणिक उपाख्यान को भावी पीढ़ी का संस्कार नहीं बनने दिया। आगे कहा कि भागवत कथाओं से लेकर गरूड़ प्रतीक प्रदर्शन में कुंभ माहात्म्य का वर्णन नहीं किया गया। और जिज्ञासुओं के प्रश्नों पर पुराण मनीषी हिचकोले खाते देखे गये।   और तो और अमृत् कलश समेत गरूड़ विश्राम के गवाह कालीदह स्थित कदम्ब तक तो कुंभ की धूल भी नहीं पहुंची।

फिर अदाकारा सांसद समेत छैला विधायक भला क्या कह पाते?  इतना जरूर हुआ कि वृन्दावन कुंभ मेला उचित मार्गदर्शन के अभाव में भागवत झमेला बनता गया और भागवत प्रसंगों की निजी व्याख्यायें आपस में उलझती रहीं। कहा कि लम्बे समय और अनथक प्रयासों से सुसज्जित कुंभ प्रदर्शनी में सरकारी, अर्द्धसरकारी समेत गैर सरकारी संस्थायें पौराणिक उपाख्यान को प्रदर्श का हिस्सा नहीं बना सकी और प्रासंगिक संदर्भ फिल्मांकन से अछूता रह गया। नतीजन प्रदर्शनी का प्रयोजन सफल नहीं हो सका। जबकि कुंभ को सफल बनाने में संन्यस्तों के साथ गृहस्थों ने जी भर हाथ बटाया। फिर भी आगंतुकों के नौनिहाल उचित स्थान नहीं ढूंढ़ पाये। कहा कि मेले की सुरक्षा में तैनात वायुडमरू (हेलीकाप्टर) कुछ दिनों तक तो आकर्षक लगा किन्तु उसके पर्यटन का हिस्सा बनने पर लोगबाग बोर होने लगे। मजे की बात तो यह रही कि प्राकृतिक आपदा के पश्चात् वायुडमरू का उपयोग नहीं किसा गया जिसके लिए उसकी तैनाती की गई थी। कहा कि पेयजल की व्यवस्था में गंगाजल की सप्लाई खूब भाती रही किन्तु पंजाब नेशनल बैंक और पीलो कम्पनी के सौजन्य से संचालित आर00 प्लान्ट तमाम असुविधाओं के बावजूद श्रद्धालुओं के कण्ठ तृप्त करता रहा।



डॉ0 शर्मा ने सैकड़ों एकड़ भूमि में फैले हजारों खालसों की भागीदारी पर हर्ष जताया। कहा कि सरकारी आंकड़ों में गिनती न होने के बावजूद तपस्वी खालसे आत्मलाभ करते रहे। किन्तु तेरह भाई त्यागी खालसा ने श्रद्धालुओं भरपूर भीड़ बटोरी। आगे कहा कि साधू-सन्तों समेत वैष्णवों की सेवा में यद्यपि कृष्ण- बलराम, राधामुरारी मोहन, डाकौर-इन्दौर, रूप सनातन, कृष्ण कल्याण नगर, राम  कृष्ण नगर, जगन्नाथ आश्रम, ब्राह्मण सभा, खेड़ापति हनुमान खालसा, नरोत्तम नगर आदि खालसे यथाशक्ति भण्डारे करते रहे। इसी के साथ इस्कॉन, अखिल भारतीय संतमत सत्संग आदि जनजागरण करते रहे। फिर भी टटिया स्थान, देवरहा बाबा, आश्रम और सुदामा कुटी के मुकाबले टक्करी भण्डारा देने में असफल रहे। कहा कि दान दक्षिणा प्रसाद समेत व्यवस्था में टटिया स्थान टाप होता गया और साधन के बावजूद व्यवस्था में हीलाहवाली के चलते देवरहा और सुदामा कुटी क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर खिसक गये। इसी क्रम में गोरे दाऊजी और सूरदास आश्रम सामयिक सेवा से सन्तों को सन्तुष्ट करते रहे। खुलासा किया कि अतीत में टटिया स्थान ने भण्डारा सेवा में तत्कालीन वृन्दावन के सेठ भक्त लालाबाबू उस वक्त पीछे छोड़ दिया था, जब टटिया के मुकाबले दक्षिणा में लालाबाबू के रूपये चांदी के बजाय लोहे के निकले थे।



डॉ0 शर्मा ने धार्मिक पर्व के बाजारीकरण पर क्षोभ जताया। कहा कि सीमित स्थानों में अतिशय विज्ञापनों से श्रद्धालुओं पर प्रभाव के बजाय आक्रोश बढ़ता गया और सरकार के साथ खबरखोरों के विज्ञापन कूड़ेदान के पात्र बने।

डॉ0 शर्मा ने बारहवर्षीय वृन्दावन कुम्भ को त्रैवार्षिक महोत्सव में परिवर्तित करने की माँग की। कहा कि देवताओं समेत असुरों के बीच अमृत संघर्ष ने प्रयाग, हरिद्वार, नासिक समेत उज्जैन में कुम्भ की बुनियाद डाली। किन्तु उससे पूर्व भगवान गरूड़ ने सर्वप्रथम अमृत कलश वृन्दावन लाकर कुंभ परम्परा की शुरूआत की थी। फिर वृन्दावन त्रैवाषिक आयोजन से क्यों वंचित किया गया?           

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