हिन्दी
के राष्ट्रभाषाई दर्जे पर सवाल
अनैतिहासिक
14 सितम्बरी राष्ट्रीय हिन्दी दिवस के विरोध में प्रदर्शन
18
अप्रैली राष्ट्रीय हिन्दी दिवसीय प्रस्थापना पर जोर
अनुत्तरित
आरटीआई पर रोष
मथुरा,
भारतीय राष्ट्रवाद के मंचन में पेश दावे माना कि
संवैधानिक विश्वास जगाने में कामयाब रहे हैं। मगर राष्ट्रीय सीमा की तरह उलझी राजभाषा
हिन्दी आजादी के 74 वर्षों के बावजूद भारतमाता के माथे की बिन्दी को तरसती रही है।
यह
मंथन डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में 14 सितम्बरी
हिन्दी दिवस के विरोध में 18 अप्रैली राष्ट्रीय हिन्दी दिवसीय आन्दोलन की प्रथम वर्षगांठ
पर राधाष्टमी के दिन मंगलवार को विश्रामघाट क्षेत्र मे आयोजित प्रदर्शन सभा में किया
गया।
संस्थान
के संस्थापक अध्यक्ष एवं 18 अप्रैली राष्ट्रीय हिन्दी दिवसीय आन्दोलन के सूत्रधार डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि भारत में
15 अगस्त समेत 26 जनवरी को आजादी की दास्ताँ एवं संवैधानिक विकास के नजरिये राष्ट्रीय
दर्जा प्रदान किया गया। किन्तु आजादी समेत संवैधानिक इतिहास को जुबां देने के बावजूद
देवनागरी राष्ट्रभाषाई अधिकार से वंचित होती रही। आगे कहा कि सम्राट अशोक के शिलालेखों
से लेकर गुलाम भारत के युग में महाकाव्यों की जन्मदात्री देवनागरी (हिन्दी) की आजाद
भारत में राष्ट्रीय अधिकार से उपेक्षा साफ बयां करती है कि भारत अभी भी गुलामी की जंजीरों
में जकड़ा हुआ है। वरना कोई वजह नहीं थी कि उत्तर भारत की समस्त लिपियों समेत दक्षिण
को प्रभावित करने वाली देवनागरी के राष्ट्रभाषाई दर्जे पर सवाल खड़े किये जाते। कहा
कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आगमन बाद 1837 तक अंग्रेजों के दिलोदिमाग पर छाई देवनागरी
एकाएक सरकारी कामकाज में अंग्रेजी से विस्थापित होने पर 63 वर्षा ें तक पाश्चात्य विद्वानों के संघर्ष से सिंचित
होती रही। तब कहीं वह 18 अप्रैल 1900 को भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय के हाथों संयुक्त
प्रान्त में फारसी व अंग्रेजी पर विजय हासिल कर सकी। मगर बदकिस्मती की क्या कहें? गुलाम
भारत में संघर्ष करते हुए जब देवनागरी (हिन्दी) आजादी के बाद राष्ट्रभाषा की दावेदार
हो गई तो 1949 में 14 सितम्बर को उसे राजभाषा तक सीमित कर न केवल उसका राष्ट्रभाषाई
हक छीना गया बल्कि उसके फारसीकरण के खिलाफ छिड़े संघर्ष में शामिल फ्रेडरिक जॉन शोर,
पिंकौट, एफ0 एस0 ग्राउज आदि पाश्चात्य विद्वानों के योगदान हाशिये से नहीं निकलने दिये
गये।
डॉ0
शर्मा ने रोष जताया कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दौर में गवर्नर जनरल ‘सदरे रियासत’और सर्वोच्च
न्यायालय ‘सदर दीवानी अदालत’ अभिलिखित देवनागरी (हिन्दी) मुहरें सरकार
की शान मानी जाती थीं। मगर आजाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आज सिर्फ अंग्रेजी के
प्रार्थना पत्र स्वीकार किये जाते हैं। यह कैसी आजादी है जिस पर 74 वर्षाें से गर्ववान्वित
हुआ जा रहा है? आगे कहा कि हुक्मरान अंग्रेजों को तानाशाही के चलते माना कि पूरी दुनिया
से हटाया गया। मगर उनके द्वारा स्थापित राष्ट्रप्रेम विश्व के लिए नसीहत है। कहा कि
लन्दन के कुलियों की भाषा अंग्रेजी आज राष्ट्रवादी चिंतन के चलते विश्व में छाई है।
जिसे उन्होंने देवनागरी समेत अन्य भाषाओं के विज्ञान से जोड़कर जमीन से आसमान पर उठा
दिया। और भारत में वेदों से हस्ताक्षरित हिन्दी उल्टे आकाश से पाताल पहुँचा दी गई।
यही वजह है कि अंग्रेजों के चंगुल से आजाद मुल्कों की भाषायें छद्म राष्ट्रवाद के चलते
पनप नहीं पा रही हैं। मसलन पाकिस्तान समेत बांग्लादेश में उर्दू और बांग्ला राष्ट्रभाषायें
तो बन गई किन्तु राष्ट्रनिष्ठा के अभाव में उनका भी संभावित विकास नहीं हो पाया है।
कहा कि देवनागरी (हिन्दी) को आज सच्चे सेवकों की जरूरत है जो फ्रेडरिक जॉन शोर, पिंकौट,
ग्रीव्स, एफ0 एस0 ग्राउज, समेत भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय की तरह हिन्दी के लिए
जरूरी संघर्ष कर सकें। फिर उसके राष्ट्रीय और विश्वभाषाई दरवाजे स्वतः खुल जायेंगे।
डॉ0
शर्मा ने हिन्दी के 18 अप्रैली महत्व पर महामहिम राष्ट्रपति को प्रेषित आरटीआई के जवाब
पर क्षोभ जताया। आगे कहा कि हिन्दी की अहमीयत के जिम्मेदार एक मात्र गृह मंत्रालय के
जवाब से साफ है कि शासन की हिन्दी अतीत में कोई अभिरूचि नहीं है। नतीजन सरकारी पाठ्यक्रमों
में हिन्दी संघर्ष का जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है, उसका वास्तविकता से कोई लेना-देना
नहीं है। फिर राष्ट्रीय और विश्व हिन्दी सम्मेलनों में हिन्दी संघर्ष के मौलिक मुद्दे
भला कैसे उठाये जाते? आखिर जब हिन्दी के राष्ट्रीय और वैश्विक आयोजन सवालों के कटघरे में खड़े हो गये
तो सरकारें सच्चाई से मुँह फेरने लगी हैं। कहा कि जैसे हिन्दी के लिए 1949 में ईजाद
राष्ट्रीय दिवस भ्रामक है, वैसे ही विश्व हिन्दी दिवस के लिए चयनित 10 जनवरी उससे भी
ज्यादा घातक है क्योंकि उससे हिन्दी संघर्ष का इतिहास और गहरी खाई में जा पड़ेगा। परिणामस्वरूप
हिन्दी का विश्वस्तरीय स्वरूप 10 जनवरीय विश्व हिन्दी दिवस से मूल्यांकित किया जायेगा
और 18 अप्रैल की भाषाई विजय महत्वाकांक्षाओं के भंवर में सदा के लिए डुबा दी जायेगी।
उसी के साथ 1881 के बर्लिन सम्मेलन में विश्वभाषा के सवाल पर राधाचरण गोस्वामी का देवनागरी
संघर्ष झंझावातों में खो जायेगा। और सन्
1975 का नागपुर का प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन हिन्दी के इतिहास में मील का पत्थर माना
जाने लगेगा जिसका श्रेय भारत की प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी की झोली में जा गिरा।
उसके बाद तो हिन्दी मौज-मस्ती का विषय बनती गई और उसी तर्ज पर मॉरीशस में विश्व हिन्दी
सचिवालय स्थापित किया गया।
डॉ0
शर्मा ने हिन्दी सम्मेलनों के सियासतीकरण पर आक्रोश जताया। कहा कि दसवां विश्व हिन्दी
सम्मेलन 16वीं लोकसभा की सरकार ने मध्य प्रदेश की गिरती भाजपाई शाख उबारने के लिए संस्थान की परियोजना
का दुरूपयोग किया। कहा कि महामना मदनमोहन मालवीय के भारतरत्न पश्चात् संस्थान द्वारा
प्रेषित महामना मेमोरियल प्लान की चोरी, शोषण एवं दुरूपयोग करते हुए दसवां विश्व हिन्दी
सम्मेलन व्यापमं एवं ललित मोदी विवादों की भरपाई के चलते बनारस के बजाय भोपाल में आयोजित
कराया गया। कहा कि दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में चोरी, शोषण एवं दुरूपयोग के चलते
बलिदान भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय के हिन्दी संघर्ष के बरखिलाफ छिड़़े संघर्ष
को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ था। तब तक सरकार ने ग्यारहवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में
महात्मा गांधी के दक्षिणी प्रयोग को ठुकराकर नई मुसीबत गोबर के मोल खरीद ली। कहा कि
2018 में मॉरीशस में आयोजित सम्मेलन दरअसल दक्षिण भारत में आयोजित कराया जाना चाहिए
था। कारण कि उस वर्ष विश्ववंद्य विश्वात्मा महात्मा गांधी द्वारा राष्ट्रीय एकता के
मद्देनजर वर्ष 1918 ने दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार-प्रसार के सौ वर्ष पूरे किये
थे। मगर विशेषज्ञों समेत हुक्मरानों को हिन्दी के अभिनव इतिहास का भान नहीं हुआ और
दक्षिण भारत में अपेक्षित सम्मेलन मॉरीशस में आयोजित करके महात्मा गांधी के हिन्दी
संघर्ष को दरकिनार किया गया। मजे की बात तो यह रही कि मॉरीशस सम्मेलन पर संस्थान की
प्रतिक्रिया भारत में प्रकाशित होने पर सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों ने वर्ष
2019 में नई दिल्ली के कनॉट प्लेस क्षेत्र स्थित एनडीएमसी सभागार में गांधी केन्द्रित
दूसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित कराया। किन्तु पूरा प्रयोजन पुनः सिर्फ इसलिए असफल
हो गया क्योंकि प्रायश्चितकारी सम्मेलन महात्मा गांधी की अध्यक्षता में वर्ष 1919 में
बंबई में आयोजित प्रयाग हिन्दी सम्मेलन के उस शताब्दिक अधिवेशन पर अमल नहीं कर पाया
जिसमें भारतरत्न महामना मदनमाहन मालवीय के आह्वान पर हिन्दी को अखण्ड भारत की राष्ट्रभाषा
घोषित करने का प्रथम वैधानिक प्रस्ताव पारित किया गया था।
डॉ0
शर्मा ने उत्तर भारत में हरियाणा राज्य के हिन्दी संघर्ष की उपेक्षा पर क्षोभ जताया।
कहा कि हिन्दी के लिए हरियाणा ने जो त्याग और बलिदान किया है, उसे स्वर्णाक्षरों में
अंकित स्मारक का दर्जा देना चाहिए था। मगर राज्य के अर्द्धशताब्दिक अस्तित्व के बावजूद
सरकार समेत नागरिकों ने हिन्दी बलिदानियों का स्मरण नहीं किया। नतीजन हरियाणा के लिए
जो जीते और मरते रहे, लोगबाग उन्हें भूलते गये जिसके चलते चौधरी बदलूराम तमाम योगदान
के बावजूद हरियाणा के आधुनिक इतिहास से बहिष्कृत हो गये।
इससे
पूर्व उपस्थितों ने माँ यमुना समेत भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय व राधाचरण गोस्वामी
के चित्रपटों पर पुष्पार्चन से आयोजन की शुरूआत की। तत्पश्चात् आयोजन स्थल भारत माता
व माँ यमुना के जयकारों व ‘‘जब तक सूरज चाँद रहेंगे, ’ ग्राउज महामना के नाम रहेंगे’ राष्ट्रीय
हिन्दी दिवस उसे बनायें’, इतिहास समर्थित जिसको पायें’ नारों
से गूँज उठा।
इस अवसर पर राधेश्याम तिवारी, विपिन चतुर्वेदी, मनोज चतुर्वेदी, चिन्ताहरी चतुर्वेदी, अजय चतुर्वेदी, विजय, शरद, राकेश चतुर्वेदी, रविशंकर आदि उपस्थित थे।








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