100वीं वर्षगांठ पर वस्त्र विसर्जन क्षेत्र चौकी बाग बहादुर में आयोजन
आयोजन की सर्वांगीण उपेक्षा पर रोष
मथुरा,
विश्ववंद्य विश्वात्मा
महात्मा गांधी की यादगार को लेकर देश-विदेश में माना कि सैकड़ों स्मारक ईजाद किये गये
हैं। मगर मथुरा में महात्मा की पहली भारतीय गिरफ्तारी समेत प्रथम वस्त्र विसर्जन की
ऐसी दुर्लभ स्मृतियों की उपेक्षा की गई है जिन्हें विश्व धरोहर में शामिल किये बगैर
स्मरण प्रकल्प अधूरा रहेगा।
यह आह्वान डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान
में मंगलवार को चौकी बागबहादुर क्षेत्र में आयोजित ‘विश्व धरोहर में दर्ज हो मथुरा
का गांधी वस्त्र विसर्जन’ खुला मंच में किया गया।
संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं ब्रजमंडल में गांधी स्मृतियों
के पुनर्खोजी डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि महात्मा गांधी की निर्मम हत्या
के बाद उनके नाम और काम को जितना भुनाया गया है, न्यस्त स्वार्थाें के चलते उन्हें उससे ज्यादा भुलाया गया है। आगे कहा कि वर्ष 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं
जयन्ती पर रौलट विरोध के चलते उनकी मथुरा में पहली भारतीय गिरफ्तारी का खुलासा किया
गया था। मगर गांधी शोहरत भुनाने के फेर में भारतीय प्रधान मंत्री के कानों पर जूं तक
नहीं रेंगी जबकि उसी दौर में पाकिस्तान के सुल्तानिए जम्हूर इमरान खान ने जलियांवालाबाग नृशंस नरसंहार पर मार्मिक
वक्तव्य देकर पूरे भारत का दिल जीत लिया था और मथुरा के आयोजन की भनक लगने पर राहुल-प्रियंका
झट राजघाट दौड़ पड़े थे। कहा कि पहली भारतीय गिरफ्तारी की तर्ज पर महात्मा गांधी द्वारा
मथुरा में प्रथम वस्त्र विसर्जन का खुलासा
वर्ष 2008 में विश्वविख्यात पुरातत्वविद् डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा की द्वितीय पुण्यतिथि पर मथुरा संग्रहालय में आयोजित
मुख्य वक्ता दार्शनिक व प्रशासक आर0 के0 सिंह के प्रथम स्मारकीय व्याख्यान में किया
गया। किन्तु 13 वर्षों के लम्बे दौर में सरकार समेत समाज ने गांधी वस्त्र विसर्जन को
यादगार नहीं बनाया। कहा कि आयोजन से पूर्व मीडिया समेत जनप्रतिनिधियों को शताब्दिक
आयोजन को समझाया गया। फिर भी समस्त व्यवस्थायें अन्ततः एकल प्रयासों से सम्पन्न हो
सकी।
डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि मौजूदा अदाकारा सांसद समेत छैला
विधायक की रंगीन सोच-समझ के चलते सूबे के अलबेले मुखिया योगी आदित्यनाथ कुंभ मेले की
संपूर्ण असफलता के बावजूद उसी क्षेत्र में कचौड़ी-पकौड़ी मेले पर रीझ गये। नतीजन जनधन
का करोड़ों रूपया सिरफिरे प्रयोजन पर पानी की तरह बहाया गया। मगर गांधी वस्त्र विसर्जन
सूना का सूना रह गया।
डॉ0 शर्मा ने खुलासा किया कि महात्मा गांधी ने मथुरा में दिल्ली
पॉलिटिकल कांफ्रेंस के त्रिदिवसीय आयोजन में ऊपरी वस्त्रों का विसर्जन उस घटना से प्रेरित
होकर किया था जो मद्रास यात्रा के दौरान रेलगाड़ी में घटी थी। आगे कहा कि महात्मा ने
जब रेलयात्रा के दौरान डिब्बे में कुछ मजदूरों को विदेशी कपड़े पहने देखा तो उन्होंने
मजदूरों से खादी पहनने के लिए कहा। किन्तु मजदूरों ने बापू से खादी पहनने में असमर्थता
व्यक्त की क्योंकि उनकी आमदनी से वह काफी महंगी थी। उस घटना से प्रेरित होकर महात्मा
गांधी ने मद्रास से मथुरा आने पर वर्ष 1921 के नवम्बर माह में वस्त्रों का इसलिए परित्याग
किया ताकि कोई गरीब उन्हें पहन सके।
डॉ0 शर्मा ने सांस्कृतिक राजधानी में संस्कृति के हनन पर आक्रोश जताया। आगे कहा कि सरकारी उपेक्षा के चलते ब्रजमण्डल की अर्वाचीन धरोहर पर संकट के बादल गहराते जा रहे हैं और जमीनों की बढ़ती कीमतें दुर्लभ स्मारकों को निगलती जा रही हैं। कहा कि 1857 की अगर बात करें तो स्वाधीनता संघर्ष की 150वीं वर्षगांठ पर ब्रज के मंगल पाण्डे अख्तियार खां की पहली गोली के शिकार 67वीं नेटिव इन्फैंट्री के लेफ्टिनेंट पी0 एच0 सी बर्लटन की कब्र प्रशासन समेत मीडिया की आंखों का नूर साबित होने के बावजूद संरक्षित स्मारक नहीं बन सकी। जबकि संस्थान के प्रयास मामले को लन्दन तक ले गये। परिणामस्वरूप ब्रिटिश एसोसिएशन फॉर सीमेट्रिज इन साउथ ईस्ट एशिया ने ऐतिहासिक घटना को वर्ष 2018 में अपने मुखपत्र ‘चौकीदार’ में स्थान भी प्रदान किया। मगर ब्रज के स्वाधीनता संघर्ष का दुर्लभ स्मारक आज भी अपनी उपेक्षा पर आंसू बहा रहा है। कहा कि अर्वाचीन विरासत की विश्वविख्यात प्रासंगिकता के चलते संस्थान ने वर्ष 2010 में ‘संवैधानिक चेतना बनाम क्षेत्रीय विकास’ विषयक आयोजन के तहत मथुरा में स्वाधीनता संग्रहालय की स्थापना का सवाल उठाया था। किन्तु आयोजन में तत्कालीन विधायक पूरन प्रकाश एवं बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी एण्ड मैनेजमेंट के निदेशक हरबंश चतुर्वेदी की प्रतिभागिता एवं स्वीकृति के बावजूद परियोजना इंच भर भी आगे नहीं बढ़ सकी। कहा कि संस्थान के अनवरत प्रयासों में वर्ष 2019 में तत्कालीन जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र के साथ मथुरा के 1857 समेत गांधी इतिहास पर विस्तृत चर्चा होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया और विकास को समर्थित ट्रस्ट फिजूलखर्ची में जनधन बरबाद करता रहा। और तो और स्वयं नगर निगम स्वाधीनता
संघर्ष से संबंधित होने के बावजूद संस्थान के लिखित प्रयत्नों की उपेक्षा करता गया।




Comments
Post a Comment