महानायक के राजनीतिकरण पर रोष
क्रांतिदूत विभूषण पर जोर
मथुरा,
विश्ववंद्य विश्वात्मा महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी समेत क्रांतिदूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का सुभाषित सपना तभी साकार होगा जब अखण्ड भारत विश्व में रामराज्य की स्थापना करेगा।
ये उद्गार क्रांतिदूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 125वीं जयन्ती एवं तदनुक्रम में ‘प्रदेश उबारो देश संवारो’ आन्दोलन की पांचवी वर्षगांठ पर डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में विश्रामघाट क्षेत्र में आयोजित ‘अखण्ड बनाम विभाजित भारत’ खुला मंच में किया गया।
संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं प्रदेश संवारो देश उबारो आन्दोलन के प्रवर्तक डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि सरकारें राष्ट्रीय आन्दोलन के महानायकों की छवि तो भुना रही हैं। मगर उनके आदर्शों पर रंच मात्र भी नहीं चल पा रही हैं। आगे कहा कि महात्मा गांधी समेत क्रांतिदूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का संघर्ष सिर्फ गुलामी से मुक्त होने के लिए नहीं बल्कि भारत के स्वर्णिम अतीत की पुनसर््थापना के लिए भी था। लिहाजा जब तक देश एकजुट होकर सांस, प्यास और भूख से उबरने के लिए संघर्ष न करे तब तक रामराज्य स्थापित नहीं हो सकेगा। कहा कि यह अजीब विडम्बना है कि 50 साल पहले उठा रोटी, कपड़ा और मकान का सवाल विकास के साथ ऊपर उठने के बजाय सांस, प्यास और भूख के पायदान पर नीचे खिसक गया है। जिसके चलते आज नहीं तो कल धरती का जीवन चक्र प्रभावित हो सकता है। मगर सरकारें हैं कि विकास के नाम पर जनमानस को अंधेरे में रखने से बाज नहीं आ रही हैं और जबकि आम आदमी लुभावने आश्वासनों में मौत के मुँह में समाता चला जा रहा है। कहा कि मौजूदा राजनीतिक दल जिन क्षुद्र स्वार्थाें के वशीभूत सूबे को मन्दिर-मस्जिद और दलित-बलित में बांटकर कमजोर कर रहे हैं। उससे प्रदेश और देश का कभी भला नहीं होगा। फिर गांधी और सुभाष के सपनों का क्या हश्र होगा? कहा कि अजीब बात है कि 30 साल पूर्व अमेरिकन वैज्ञानिकों ने केन्द्र समेत राज्य सरकार को आगाह किया था कि उत्तर प्रदेश के भूजल में बड़ी तेजी से आर्सेनिक फैलाया जा रहा है। मगर सरकारों ने जीवनदायी मौलिक मुद्दे की अनसुनी की और जनमानस को मन्दिर-मस्जिद, दलित-बलित के नशे में सुलाये रखा। नतीजन करोड़ों वर्ष में बना भूजल चेतावनी के महज 15 साल बाद आरओ वाटर में तब्दील हो गया। कहा कि जब देश में हवा, पानी और भोजन ही खतरे में पड़ जायेगा तो गांधी, सुभाष, पटेल समेत अम्बेडकर की प्रतिमायें किस काम आयेंगी? और लोगबाग उन्हें कैसे याद कर सकेंगे?
डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि कोरोना के बहाने देश का आर्थिक विभाजन सबसे बड़ा जुर्म है जिसके चलते अमीर-गरीब आर-पार के संघर्ष के लिए आमने-सामने खड़े होने लगे हैं। आगे कहा कि जिस महामारी का ईलाज सिर्फ गर्म पानी का सेवन था, उसे तमाम पूर्वाग्रहों से लादकर अवाम को गुलामीयत की ओर ढकेला गया है। कहा कि कोरोना के चलते जिस तरकीब से दबंगों का संसाधनों पर अधिकार हुआ है और दुर्बल जितनी तेजी से सिमटते गये हैं। उससे भारत का कौन-सा सपना साकार होगा? यह अहम सवाल बन गया है। कहा कि भारत सिर्फ भारत है और भारत ही रहेगा। उसे यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका और चाइना नहीं बनाया जा सकेगा।
समापन से पूर्व नेताजी के लिए वर्ष 2016 में उठी ‘क्रांतिदूत’ की मांग को दोहराया गया। कहा कि प्रतिमा के साथ यदि सरकार नेताजी को अपेक्षित विभूषण से विभूषित करती तो इण्डिया गेट की प्रतिमा में चार चांद लग जाते।
इससे पूर्व उपस्थितों ने भारत माता, मां यमुना समेत क्रांतिदूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जयकारों से आयोजन की शुरूआत की। तत्पश्चात् आयोजन स्थल ‘भरे इतिहास प्रचुर सबूत फिर भी सुभाष नहि क्रांतिदूत’ ‘जब तक सूरज चांद रहेगा सुभाष चन्द्र बोस का नाम रहेगा’ नारों से गूंज उठा।
इस अवसर पर अजय पाठक, मोहन चतुर्वेदी, विपिन, दिलीप, संजय गोला प्रजापति, मुरारीलाल चतुर्वेदी, डी0 एन0 चतुर्वेदी, विजय आदि उपस्थित थे।
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