10 जनवरीय विश्व हिन्दी दिवस विरोध में प्रदर्शन
हरियाणा
में स्थापित हो हिन्दी रक्षक स्मारक
मथुरा
में विश्व हिन्दी संग्रहालय पर जोर
मथुरा,
वैज्ञानिक विलक्षणताओं के बल ईस्ट इण्डिया
कम्पनी की सुर्खियों में छाई हिन्दी यद्यपि अंग्रेजी की शैशवावस्था से परवरिश करती
रही किन्तु अंग्रेजी ने 1837 में राजभाषाई वयस्कता मिल जाने पर हिन्दी की ओर तब तक
मुड़कर नहीं देखा जब तक कि भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय के हाथों 18 अप्रैल
1900 के दिन उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रान्त) में उसकी अहमीयत पुनसर््थापित
नहीं हो गई।
यह खुलासा
विश्व हिन्दी दिवस पर डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान
में 10 जनवरी को गणेशधाम कॉलोनी स्थित संस्थान परिसर में आयोजित विश्व हिन्दी दिवस
विरोधी प्रदर्शन में किया गया।
संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं 18 अप्रैली विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन के प्रवर्तक व सूत्रधार डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि हिन्दी के राष्ट्रीय एवं विश्व दिवसीय आयोजनों के नाम पर सरकारें भारत समेत विश्व को गुमराह कर रही हैं। कारण कि 10 जनवरी समेत 14 सितम्बर का हिन्दी के वास्तविक संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं है। आगे कहा कि हिन्दी के दोहरे संघर्ष की शुरूआत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जमाने में 1837 से उस वक्त शुरू हुई थी, जब अंग्रेजी को फारसी के स्थान पर राजभाषा का दर्जा दिया गया और विस्थापित फारसी देशज भाषा के उपयोग की छूट का लाभ उठाकर हिन्दीभाषी प्रान्तों में हिन्दी का फारसीकरण करने लगी। कहा कि हिन्दी के फारसीकरण के तमाम उदाहरण ब्रज में आज भी मौजूद हैं जिनसे न केवल भाषाई विकास प्रभावित हो रहा है बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक परम्परा का भी हनन हो रहा है। कहा कि मौजूदा सरकार के सिरमौर दीनदयाल उपाध्याय की जन्मस्थली नगला चन्द्रभान कभी नगरा रहा होगा। मगर फारसीकरण में हिन्दी शब्द को जानबूझकर सरकारी दस्तावेजों में नगला किया गया जिसका हिन्दी में कोई अर्थ नहीं निकलता है। कहा कि अन्य उदाहरण में गोवर्द्धन क्षेत्र स्थित चकलेश्वर महादेव अतीत मे कभी चक्रेश्वर के नाम से विख्यात रहे किन्तु फारसीकरण में ‘र’ को ‘ल’ से विस्थापित कर तुर्की शब्द चकला से जोड़ा गया जिसका अर्थ वैश्यालय होता है। कहा कि हिन्दी के फारसीकरण के विरोध में पहली आवाज 1838 में फर्रूखाबाद के अंग्रेज जिला जज फ्रेडरिक सिल्वन जान शोर ने उठाई थी। तत्पश्चात् पिंकौट, ग्रीव्स, एफ0 एस0 ग्राउज समेत अन्य अंग्रेज विद्वान लम्बे समय तक फारसीकरण के खिलाफ लड़ते रहे। इसी बीच कुछ भारतीय विद्वानों में चेतना का संचार हुआ और राजा शिवप्रसाद, राधाचरण गोस्वामी आदि ने संघर्ष आगे बढ़ाया। किन्तु अन्तिम कामयाबी भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय द्वारा ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजूकेशन इन नार्थ वेस्ट प्राविंसेस नामक ज्ञापन से मिली और 18 अप्रैल 1900 के दिन हिन्दी उत्तर प्रदेश में सरकारी कामकाज की भाषा पर आरूढ़ हुई। कहा कि 18 अप्रैल 1900 की कामयाबी के ठीक 19 वर्ष बाद भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय द्वारा प्रयाग हिन्दी सम्मेलन के बंबई अधिवेशन में हिन्दी के राष्ट्रभाषाई अधिकार की वकालत से साफ है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाकर उसे विश्वभाषा तक पहुँचाने का प्रयोजन था। किन्तु दुर्भाग्य से महान विभूतियों के एकाएक प्रयाण से हिन्दी का विकास चक्र रूक गया। और उसे आजादी के 75 साल बाद भी राष्ट्रीय दर्जा नहीं दिया गया। फिर भी मौजूदा सरकार आजादी के स्वाभिमान पर नाच रही है। जबकि आजादी की डायमण्ड जुबिली तक भारत राष्ट्र नहीं बन सका क्योंकि उसके पास राष्ट्र निर्धारण के मौलिक तत्वों में राष्ट्रीय ध्वज छोड़कर भाषा और सीमा दोनों नहीं हैं। वहीं विभाजित पाकिस्तान समेत बांग्लादेश कम से कम इस मामले में भारत से बेहतर हैं कि उनके पास राष्ट्रभाषायें हैं और उनकी व्युत्पत्ति हिदी से हुई है। यह भी एक दिलचस्प वाकिया है अंग्रेजी की तरह हिन्दी की बेटियां राजभाषा पर नाज कर रही हैं और माँ मध्ययुगीन भक्ति की तरह 75 साल से जर्जर हो रही है।
डॉ0
शर्मा ने आक्रोश जताया कि आजादी के बाद प्रभावकारी हिन्दी संघर्ष को भावी विकास से
नहीं जुड़ने
दिया गया। नतीजन 1949 में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा देते समय 112 साल पुराना हिन्दी
संघर्ष याद नहीं किया गया और नेहरू सरकार ने 14 सितम्बर के दिन हिन्दी को राजभाषा का
दर्जा देकर अपना कर्ज उतार दिया। आगे कहा कि हिन्दी का ज्वालामुखी फिर भी धधकता रहा
और 1970 के दशक में एक बार फिर दक्षिणी विरोध
के बावजूद राष्ट्रभाषाई अधिकार के लिए आगे बढ़ा। मगर इस बार पिता के बाद पुत्री ने
1975 में 10 जनवरी के दिन नागपुर के प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में राष्ट्रभाषाई सीढ़ी
से छलांग भरते हुए लोगों को ध्यान हिन्दी के वैश्विक मुद्दे पर टिका दिया। फिर तो मन्दिरों-देवालयों
में भटकती हिन्दी के उद्धार के बजाय विदेशों के हनीमूनी स्पॉट ज्यादा उपयुक्त दिखाई
दिये और 42 साल के अन्तराल में विश्व हिन्दी सचिवालय मॉरीशस में जगह पा गया। जब कि
उसी दौर में पंजाब का एक हिस्सा हिन्दी संघर्ष में जल रहा था। मगर समूचे देश में और
न ही हरियाणा के अभ्युदय पश्चात् किसी ने हिन्दी रक्षक स्मारक की जरूरत नहीं समझी।
फिर तो चौधरी बदलूराम समेत तमाम हिन्दी संधर्ष के नेता मौज-मस्ती के उगते प्रभात में
एक-एक कर डूबते गये और सूबे के हिन्दी संघर्ष की दास्तां निशा के बाद भोर में सदा के
लिए सो गई।
डॉ0
शर्मा ने रोष जताया कि मौजूदा सरकार ने पूर्व सरकारों की तर्ज पर पिछले दोनों विश्व
हिन्दी सम्मेलनों का राजनीतिक दुरूपयोग किया।
जिसके चलते वर्ष 2015 में मथुरा से शुरू 18 अप्रैली विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन
के फलस्वरूप बनारस में संभावित सम्मेलन व्यापमं, ललित मोदी विवादों की भरपाई में भोपाल
ले जाया गया। उसी क्रम में वर्ष 2018 में मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन
के चलते महात्मा गांधी द्वारा सौ वर्ष पूर्व 1918 में हिन्दी के दक्षिणी प्रयोग पर
कुठाराघात हो गया। आगे कहा कि बात 11वें सम्मेलन की असफलता तक रहती तो भी देर-अबेर
सहन हो जाती। मगर तूफान तो उस वकत मचा जब विश्व हिन्दी परिषद ने संस्थान की समीक्षा
भुनाने के फेर में पुनः अगले वर्ष 2019 में नई दिल्ली में गांधी केन्द्रित विश्व हिन्दी
सम्मेलन आयोजित किया। गौरतलब है कि सम्मेलन में न केवल महामना बल्कि महात्मा गांधी
समेत शंकराचार्य द्वारा हिन्दी की राष्ट्रभाषाई पहल का अध्याय ही उड़ा दिया गया।
डॉ0 शर्मा ने ब्रजमण्डल के सांस्कृतिक पतन पर क्षोभ जताया। कहा कि कुषाण युग में वृहद् भारत की सांस्कृतिक राजधानी होने के बाद वर्ष 1018 में मथुरा पर गजनवी के हमले से लेकर 1857 तक ब्रज वसुन्धरा धार्मिक-सांस्कृतिक स्वाभिमान पर सर्वस्व न्यौछावर करती रही। फिर भी सदियों पुराने स्वाभिमान की यादगार में कोई विश्वविख्यात संस्थान ईजाद नहीं किया गया। कहा कि 1868 से 77 तक प्राच्यविद्या मनीषी एवं कलेक्टर एफ0 एस0 ग्राउज जरूर ब्रज विरासत के वैश्विक स्वरूप को उजागर करने में दिन-रात एक करते रहे किन्तु अंग्रेज अफ्सरों ने उन्हें काम नहीं करने दिया। यद्यपि ग्राउज अपने समय तक मथुरा संग्रहालय, सेक्रेड हार्ट, श्रीरामचरितमानस के अंग्रेजी अनुवाद, गोविन्दददेव मन्दिर एवं जामा मस्जिद संरक्षण आदि प्रयत्नों से ब्रज विरासत को नया जीवन दे चुके थे किन्तु ग्राउज के बाद ब्रज विरासतके वैश्विक पटल पर काम नहीं किया गया। हालांकि ग्राउज के सौ साल बाद विश्वविख्यात पुराविद् एवं मथुरा संग्रहालय के प्रथम निदेशक डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा बेशक उल्लेखनीय कार्य कर सके। किन्तु डॉ0 शर्मा का दायरा संग्रहालय और पुरातत्व तक सीमित रहा। लिहाजा जैन आगमों के लेखन से उपजे सरस्वती आन्दोलन समेत अष्टछाप विरासत के अध्याय हिन्दी विश्व के मानक नहीं बनाये जा सके। कहा कि ब्रज विरासत की पूर्व पृष्ठभूमि के
अलावा अर्वाचीन रहस्यदर्शियों में
जयगुरूदेव नाम प्रचारक बाबा
तुलसीदास की भविष्यवाणी पर यदि
गौर करें तो हिन्दी का मौजूदा
वैश्विक विस्तार उसे सत्य साबित
करता जारहा है। साथ ही राजधानी
परिवर्तन के लिए भविष्यत 100 मील
की दूरी भी मथुरा के निकट बैठती है।
अतएव फिर क्यों न विश्व हिन्दी
संग्रहालय मथुरा में स्थापित किया
जाये ताकि अतीत के साथ भविष्य के
मिलान बिन्दुओं से संग्रहालय हिन्दी
का विश्व में वैसे ही प्रचार-प्रसार कर
सके जैसे कि दो हजार वर्ष पूर्व मथुरा
कला ने किया था और उसकी गवाही
दुनिया के लगभग समस्त संग्रहालय
दे रहे हैं।
इससे पूर्व उपस्थितों ने सरस्वती वन्दना से आयोजन की शुरूआत की। तत्पश्चात् आयोजन ‘स्थल विश्व हिन्दी उसे बनायें, इतिहास समर्थित जिसको पायें’ ‘देश का होगा तभी विकास, याद करोगे जब इतिहास’ ‘गया छलक हिन्दी का छलघट, बिफर उठा सत्ताई गरूर, बोला वैश्विक मुद्दे पर जब, शेरे संसद शशी थरूर’ नारों से गूँज उठा।
इस अवसर पर कैलाश वर्मा, अशोक कुमार, हिमानी, लक्ष्य उपस्थित थे।
18 अप्रैल से विश्व हिन्दी की अहमीयत उजागर - डॉ0 शर्मा
https://studio.youtube.com/video/
b0a3XB6nkYE/edit
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