नृशंस संहार पश्चात् जवाहरबाग
स्मारक के राजनीतिकरण पर रोष
मथुरा,
बढ़ती उम्र सुना है कि हर सातवें साल आदमी के
तौर-तरीकों में बदलाव ला देती है। मगर भाजपा पर कुदरत का विज्ञान असर करता नहीं लगता।
तभी तो दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिकस्त खाने के सात साल बाद जवाहरबाग के राजनीतिकरण
पर श्रीकान्त, योगी समेत नरेन्द्र मोदी की क्षुद्रता पुनः उजागर हो गई।
यह आरोप डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा
स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में मूर्तित जवाहरबाग नृशंस संहार क्षेत्र
में लोकतंत्र मानवता रक्षक स्मारक की स्थापना के चुनावी दुरूपयोग पर लगाया गया।
संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष
एवं जवाहरबाग नृशंस नरसंहार क्षेत्र में लोकतंत्र मानवता रक्षक स्मारक स्थापना के स्वप्नदृष्टा
व सूत्रधार डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने खुलासा किया कि जवाहरबाग नृशंस नरसंहार क्षेत्र
में मानवता रक्षक स्मारक की स्थापना को लेकर नई दिल्ली के संसद मार्ग क्षेत्र में
2 जून 2018 को धरना-प्रदर्शन किया गया था। तत्पश्चात् प्रधान मंत्री को सौंपे गये ज्ञापन
में स्मारक की मांग की गई थी जिसे नई दिल्ली के समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया था।
अगले क्रम में आरटीआई द्वारा पीएम से पूछा भी गया था। नतीजन केन्द्र समेत राज्य सरकार
ने प्रस्ताव अनुमोदन व मूर्तन तो किया किन्तु सूत्रधार को सूचित नहीं किया। आगे कहा
कि अब जब कि चुनाव प्रचार जोरों पर है तो तथाकथित स्मारक स्थापना का श्रेय मथुरा-वृन्दावन
विधान सभा क्षेत्र के भाजपा प्रत्याशी श्रीकान्त शर्मा से जोड़ा जा रहा है और उसके
रिकार्ड भी बजाय जा रहे हैं। कहा कि जवाहरबाग पर तो सरकारों को प्रायश्चित करना चाहिए
न कि स्मारक स्थापना पर गाल बजाया जाये।
डॉ0 शर्मा ने प्रत्यारोप लगाया
कि यदि राजनीतिज्ञ, प्रशासक, मीडिया समेत आन्दोलनकारी व जनता जनार्दन इतने सजग और जागरूक रहे होते तो
स्मारक की जरूरत ही नहीं पड़ी होती। आगे कहा कि यह तो संस्थान का निजी मामला है कि
मसले पर सबसे अलग ढंग से प्रभु प्रदत्त विचारणा शक्ति का उपयोग किया गया। तब कहीं दस
लाख की आबादी में नया स्वर सुनाई दिया। कहा कि अगर प्रधान मंत्री मुख्यमंत्री समेत
क्षेत्रीय विधायक को जरा भी समझ रही होती तो नई देशना को सम्मनित किया गया होता। तब
उसके परिणाम सार्थक रहे होते। मगर दुर्भााग्य से उल्टा सोचा गया और विपरीत प्रभावकारी
प्रतिक्रिया पनप गई।
डॉ0 शर्मा ने मंगलवार को जारी
विज्ञप्ति में चेतावनी दी कि यदि सरकार समेत प्रशासन ने स्मारक स्थापना की गोपनीयता
पर मुंह नहीं खोला तो बौद्धिक सम्पदा की चोरी, शोषण एवं दुरूपयोग के विरोध में संसदीय
सवाल उठाया जायेगा।
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