प्रथम पुण्यतिथि पर विशेष
विभुक्षितं किं न करोति अर्थात
भूखा क्या नहीं करता की मिसाल वृन्दावन के अखण्डानन्द आश्रम पहुंचा चुकी थी। किन्तु
दिन ढलने के बावजूद आहार वहां भी नहीं मिल सका था। हताश होकर आश्रम के मुख्य द्वार
तक ही आया था। देखा कि सफेद कुर्ते और पायजामें में काले रंग की शख्सियत जैसे मेरा
ही इंतिजार कर रही थी।
मैंने उस शख्सियत से आश्रमवासी
समझकर भोजन व्यवस्था के बारे में पूछा। उत्तर मिला कि वह आश्रमवासी नहीं है। मगर वह
इतना तो समझ ही गया कि मुझे भूख लगी है। फिर तो भोजन का आमंत्रण मिल गया और फोगला आश्रम
के ढाबे पर व्रत के अनुसार प्रसाद पाया गया। और कुछ ही पलों में अनजानापन दोस्ती में
बदल गया। जैसे-जैसे मिलना-जुलना गहराता गया, एक दूसरे के बारे में काफी-कुछ जाना गया।
और तब उन्हें डॉ0 महेन्द्र के नाम से पुकारने लगा। बहुत जल्द यह पता चल गया कि डॉ0
महेन्द्र आई0ओ0पी0 कालेज वृन्दावन से दर्शन शास्त्र में डाक्टरेट पा चुके हैं। और उन्होंने
आदि शंकराचार्य के वेदान्त दर्शन पर कार्य किया है। धार्मिक क्षेत्र में लगाव होने
के कारण डॉ0 महेन्द्र रामकृष्ण परमहंस से प्रभावित थे और उन्होंने अपने ज्ञान के आधार
पर रामकृष्ण परमहंस को कल्कि अवतार सिद्ध किया था। इसके बाद तो वह मुझे वृन्दावन में
रामकृष्ण मठ ले जाने लगे जिसे मैं उससे पूर्व बन्द संस्था समझता था क्योंकि वहां मुझे
कोई आता-जाता नहीं दिखाई देता था।
धार्मिक गतिविधियों में डॉ0 महेन्द्र
एक ज्ञानोपलब्ध महापुरूष सौम्यकेतु हृदेश से भी प्रभावित थे जिन्होंने उन्हें लोक-परलोक
का दिग्दर्शन कराया था। डॉ0 महेन्द्र की आध्यात्मिक उपलब्धियों का अंदाजा मुझे उस वक्त
लग गया था, जब मैंने गायत्री तपोभूमि के संग्रहालय में लाल सूर्य के साथ प्रदर्शित
आचार्य श्रीराम शर्मा के चित्र के विषय में जिज्ञासा व्यक्त की थी। उस पर डॉ0 महेन्द्र
ने जब लोक-परलोक का वर्णन करना शुरू किया तो लगा कि उन्हें वह सब कुछ अनुभूत हो चुका
है जो मैंने मथुरा में डैम्पियर नगर क्षेत्र स्थित रामाश्रम सत्संग के दौरान डॉ0 चतुर्भुज
सहाय की अनुकम्पा से अनुभव किया है। अगर कुछ बाकी रह गया था तो वह थी अनुभवों की व्याख्या
जिसे डॉ0 महेन्द्र ने पूरा किया। डॉ0 महेन्द्र ने बताया कि अनुभूतियों में दिखा हरा
सूर्य स्वर्गलोक है। ऐसे ही करोड़ों सूर्याें सूर्यां से मिलकर बने महासूर्य की महाकाल संज्ञा
से डॉ0 महेन्द्र ने परिचित कराया था। डॉ0 महेन्द्र ने कुछ पुस्तकें भी लिखी थी जो स्वयं
उनके द्वारा प्रकाशित थी और उनमें वैदिक मंत्रों की अनुभवगम्य व्याख्या थी। जिसमें
कथा सनातन भागवतम् का वह अक्सर जिक्र किया करते थे और वह किसी प्रेस में प्रकाशनाधीन
भी थी। जिसे उनके गुरू ने अनुभव के बाद लिखा था और वह इतनी सटीक थी कि बिना अनुभूति
के लिखी नहीं जा सकती थी। दिव्य अनुभूतियों के वर्णन में बैकुण्ठ का भी उल्लेख किया
गया था जिसे चन्द्रपद कहा गया है, जहां अनन्त चन्द्रमा एक साथ उदित होते वैसे ही दिखाई
देते हैं जैसे कि हिमालय की चोटियां एक के बाद एक उत्तरोत्तर ऊंची दिखाई पड़ती हैं।
अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम में उसी अनुभूति का वर्णन है।
इस नजरिये से डॉ0 महेन्द्र और
मेरी अनुभूतियों में काफी कुछ समानता थी जो मुझे मथुरा में डैम्पियर नगर क्षेत्र स्थित
रामाश्रम सत्संग से अनुभूत हुई थी। हालांकि मैं गायत्री तपोभूमि और जयगुरूदेव आश्रम
से भी जुड़ा था। किन्तु अनन्त चन्द्रपद दोनों में देखने और सुनने में नहीं आया। इतना
जरूर है कि जयगुरूदेव और गायत्री दोनों में दो या तीन सविताओं के बाद ब्रह्माण्ड में
प्रवेश हो जाता है और उसे ही मुक्ति कहा गया। इस तरह अनुभूतियों में गायत्री तपोभूमि
और जयगुरूदेव में लगभग समानता जान पड़ी। किन्तु रामाश्रम का चन्द्रपद डॉ0 महेन्द्र
की व्याख्या से स्पष्ट हो गया। जो शायद शाश्वत सृष्टि का अंग होगा जहां जाने के बाद
वापस लौटना नहीं होता है। रही बात गीता के न तद्भासयते सूर्याे की तो उसे डॉ0 महेन्द्र के गुरू ने परालोक की यात्रा के आरम्भ
में उस वक्त अनुभव कर लिया था, जब एक लोक की धरती ही रोशनी दे रही थी।
डॉ0 महेन्द्र और मेरे बीच की
आध्यात्मिक समानता हम दोनों को काफी निकट ले आई थी। अगर कुछ फर्क था तो वह यह कि डॉ0
महेन्द्र 40 वर्ष की आयु तक अविवाहित रहे थे। दूसरे वह निम्न वर्ण के थे। और तीसरे
कि उनका दायरा धार्मिक गतिविधियों तक सीमित था जिसको लेकर वह मोक्षपद दिलाने का उद्घोष
भी कर चुके थे। मेरे साथ आध्यात्मिक जिज्ञासा के अलावा प्रकृति की सेवा भावना भी थी।
जो मुझे संसार की गतिविधियों से जोड़े थी। अध्यात्म और और संसार का मिलान बिन्दु मुझे
यमुना मुक्ति आन्दोलन, महामना को भारतरत्न, भोपाल के दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन समेत
11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में 18 अप्रैली विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन की अनुगूंज
मॉरीशस तक पहुंचा चुकी थी। उसी क्रम में मथुरा का जवाहरबाग नृशंस नरसंहार जब मांग के
मुताबिक लोकतंत्र मानवता रक्षक स्मारक में तब्दील हुआ तो लोगों को मेरी उपेक्षा करना
असंभव लगने लगा।
उसका कुछ असर डॉ0 महेन्द्र पर
भी होने लगा और अगर कुछ नहीं तो विरोधी स्वर जब-तब सुनाई पड़ने लगे। फिर भी जब मैंने
जवाहरबाग नृशंस नरसंहार की पांचवीं वर्षगांठ पर स्मारक स्थापना के उपलक्ष्य में 2जून
2021 के दिन कार्यक्रम रखा और ईष्ट मित्रों को प्रतिभागिता के लिए आमंत्रित किया तो
मुझे कोई व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो सहर्ष भागीदार बन सके। फिर तो बेमन से दूसरों को
बुलाया गया और जैसे-तैसे स्मारक स्थापना का सार्वजनिक खुलासा किया गया। जवाहरबाग आयोजन से पूर्व डॉ0 महेन्द्र को कई फोन
किये, बेल जाती रही किन्तु कोई जवाब नहीं आया। मैंने सोचा कि वैसे तो हर कार्यक्रम
में मन-बेमन से साथ दे देते थे। इस बार लगता है नाराजगी ज्यादा हो गई है इसलिए फोन
तक नहीं उठाया। मुझे भी गुस्सा आया तो मैंने भी सोच लिया कि बुलाने बिलकुल नहीं जाऊंगा।
भले ही कार्यक्रम अकेले क्यों न करना पड़े? पूर्व में डॉ0 महेन्द्र मथुरा आकाशवाणी
के कार्यक्रम में ऐसा कर चुके थे। मेरे मॉरीशस से लौटने पर आकाशवाणी की इच्छा हुई कि
मुझे उचित सम्मान दिया जाये। लिहाजा 18 अप्रैली विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन पर भव्य
कार्यक्रम रखा गया। डॉ0 महेन्द्र उस कार्यक्रम में वृन्दावन जाकर बुलाये जाने पर आने
को राजी हुए थे।
मैंने कार्यक्रम तो कर लिया किन्तु
डॉ0 महेन्द्र से नाराजगी बनी रही और फोन पर संपर्क छूट गया। इतना जरूर था कि वृन्दावन,
मथुरा में आते -जाते मिलेंगे तभी बातचीत होगी। फिर कोई सिलसिला बनेगा तो चलता रहेगा।
मगर दिन-महीने बीतते गये और वह घड़ी नहीं आई। आखिर हारकर एक दिन वृन्दावन में डॉ0 महेन्द्र
के घर की ओर मुड़ गया। पूछताछ करने पर पता चला कि उनकी 30 मई 2021 को हत्या हो गई।



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