100वीं जन्म शताब्दी पर 20 वर्ष पूर्व अनुभूत संस्मरण
तालबद्ध गायन में लीन नवयुवतियों का जमघट, लय पर थिरकन, चपल भावभंगिमायें, सुरभित परिवेश, सुप्रभातीय ताजगी, सर्वत्र सुख, प्रफुल्लता, आनन्दातिरेक, कुछ पाने की होड़ में आपसी कश्मकश के बीच विराजमान दीर्घकाय विभूति की हर अदा पर न्यौछावर दिलोजान देखकर लगा कि जगतगुरू कृपालु महाराज सच में जितने प्रचारित हैं, उनमें उससे कहीं ज्यादा दैवीय ऊर्जा व्याप्त है।
उपर्युक्त पंक्तियों में लेखनबद्ध संस्मरण की रंगीनियत से नहीं लगता है कि बात 20 साल से ज्यादा पुरानी है। यह मुझे उस वक्त अनुभूत हुआ जब मैं वर्ष 2002 के मई माह की 14 तारीख से पूर्व शोध संस्थान के बजाय अन्यत्र सेवा तलाशने के लिए बाध्य हुआ था। हालांकि इससे पहले महाराजजी से मेरा साक्षात्कार एक दिन पहले हो चुका था। मेरे मनगढ़ पहुंचने के वक्त महाराज जी भक्तों के विनोद लीला करके निज स्थान पर लौटे ही थे। उनसे सम्पर्क के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तो सेवकों ने मुझे रोक दिया। महाराज जी कक्ष में प्रवेश कर चुके थे किन्तु उन्होंने जब सुना कि कोई मिलने आया है तो उन्होंने स्वयं कहा कि नहीं नहीं आने दो।
मैंने महाराजश्री के श्रीचरणों में सिर रख दिया भेट में लायें फल अर्पित किये। उस वक्त मुझे अनुभव हुआ कि मेरे मन में एकाएक बुरे विचार आने लगे। मैं डर सा गया कि यह सब कैसे हो रहा है? मैं तो वृन्दावन से महाराज के दर्शन और सेवा के आदेश के लिए आया था किन्तु यहाँ तो मेरी अन्तर्दशा ही कुछ और है। थोड़ी ही देर में अन्तर्मन में एक विचार गूँज उठा कि यह उस दुष्टात्मा का असर है जिसने सारे जीवन तुम्हंे तरक्की नहीं करने दी। पॉजिटिव-निगेटिव द्वन्द के बीच मैंने अपने आपको संभाला और महाराज जी से अपना दुःख सुनाया कि मैं वृन्दावन से आया हूँ, वहाँ एक वर्ष के लिए शोध संसथान की अस्थायी नौकरी पर था जो कि अब पूरा हो चुका है और मुझे अन्यत्र सेवा ढूँढ़़ने का आदेश भी दे दिया गया है। इस उलझन में शोध संस्थान के पूर्व निदेशक नरेश चन्द्र बंसल मुझे संस्थान के निकटस्थ वृन्दावन स्थित श्यामाश्याम धाम ले गये थे। श्री बंसल जी ने श्यामाश्याम धाम में मेरा परिचय मिसाइल साइंटिस्ट रामाराव जी से करा दिया। रामाराव जी भारत के तत्कालीन 11वें राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ काम कर चुके थे। श्री रामाराव ने मुझे एक हजार रूपये देकर आपके पास यह सुझाव देकर भेज दिया कि महाराज जी के पास कुछ भेंट लेकर जाना। इस तरह मैं वृन्दावन से मनगढ़ आपके पास आ गया।
महाराज जी मेरी बात सुनकर कुछ बोले तो नहीं लेकिन मुझे मनगढ़ में ठहरने की अनुमति मिल गई। भव्य चमाचम मन्दिर प्रांगण में पहले दिन तो साधारण भवन में स्थान दिया गया। उसके अगले दिन महाराजश्री के दर्शन पुनः उस वक्त हुए जब प्रभात फेरी हो रही थी। फिर तो उनके विनोदी स्वभाव के कई वाकिआत अनुभव हुए। माताओं को देखकर महाराज श्री अक्सर आसिफ रिजवी का मिसरा दोहरा देते थे कि
‘मेरे महबूब ने वादा किया है पांचवें दिन का, किसी से सुन लिया होता कि दुनिया चार दिन की है‘।
इस पर बड़ा परिहास होता था। एक बार का संस्मरण तो दिल छू गया। जब महाराजी जी भक्तों का भजन सुन रहे थे और हास-परिहास में कभी अपना जूता भक्तों पर फेंक देते थे। उसी दौरान मैंने देखा कि महाराजजी एकाएक आसन से उठे और मोबाइल चेयर पर बैठकर दूर कमरे की ओर भागे। उनके पीछे सब लोग भागे तो मैं भी सबके साथ कौतूहलवश भागने लगा कि देखे होता क्या है? कुछ ही देर में महाराज जी आश्रम परिसर में ही दूरस्थ भवन में एक कमरे के सामने रूके, व्हील चेयर से उतरे और कमरे में प्रवेश किये। मैंने बाहर से देखा कि एक अधेड़ उम्र की माताजी हृदय पीड़ा से पीडि़त थी। महाराज जी ने उन्हें तत्काल चिकित्सीय परामर्श देकर इलाहाबाद भेज दिया।
यह मेरा पहला अनुभव था जब मैंने महाराजजी के चमत्कारी प्रभाव को महसूस किया कि कहाँ तो वह भक्तों के साथ खिलवाड़ कर रहे थे लेकिन वहाँ भी उन्हें दूरस्थ कमरे में पीडि़त माताजी की पुकार सुनाई दी और वह सीधे मदद के लिए दौड़ पड़े।




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