रामत्व प्रेरित वायु, जल, खाद्यान्न संरक्षण पर जोर जीवन्त मन्दिरों से खुशहाल होगा
विश्व राममन्दिर पूजन पर मंथन मथुरा, वायु, जल एवं रोटी में समाहित रामत्व की
सुरक्षा बगैर राममन्दिरी रामराज्य दबंगों का केन्द्र सिद्ध होगा। No alt text
provided for this image इस भवतव्यता पर डा0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा
संस्थान के तत्वावधान में राममन्दिर पूजन पर बुधवार को गणेशधाम कालोनी स्थित
संस्थान परिसर की बैठक में मंथन किया गया। संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं
बाबरी-राम हताहती स्मारक के स्वप्नदृष्टा डा0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने आरोप लगाया कि
संपूर्ण विश्व भगवान श्रीराम के ब्रह्मा, विष्णु, शिवत्वरूपी वायु, जल, और रोटी के
संकट से कराह रहा है और भारत में राम के नाम पर सियासी मोहरे बिछाये जा रहे हैं।
आगे कहा कि ईंट-पत्थरों के धर्मस्थलों से न तो किसी की सांस चलेगी, न प्यास बुझेगी
और न ही भूख मिटेगी। मगर धर्म की आड़ में दुर्बलों के नृशंस नरसंहार पर दबंगों की
मौजमस्ती का रास्ता खूब तैयार किया जा रहा है। कहा कि उŸार प्रदेश में राममन्दिर
आन्दोलन की शुरूआत के दौर में अमेरिकन वैज्ञानिकों ने रामत्व समेत जिंदगी के दूसरे
अनमोल रतन भूजल में तेजी से फैल रहे आर्सेनिक जहर से सावधान किया था। मगर स्वार्थी
ताकतों ने राम के मौलिक स्वरूप को छिपा दिया और प्रतीकी चिह्नों पर साम्प्रदायिकता
को अंजाम दिया। नजीजन बलिया में भूजल पीने से मौते हुई और सूबे में आर0 ओ0 अनिवार्य
हो गया। कहा कि धर्मोन्माद को हवा देकर कभी विभाजन की बुनियाद रखी रखी गई थी और अब
उसे मजबूत किया जा रहा है। डा0 शर्मा ने खुलासा किया कि भाजपा अनुसरित रामराज्य के
आदि स्वप्नदृष्टा गोस्वामी तुलसीदास अयोध्या प्रवास के दौरान उसी मस्जिद में रात्रि
विश्राम पाया करते थे जिसे बाबरी के नाम पर ढहा दिया गया। आगे कहा कि स्वयं
तुलसीदास ने मन्दिर में खाइबो, मस्जिद में सोइबो कहकर उस सच्चाई को बयां किया है।
मगर दुर्भाग्य को क्या कहें मोघाशा में मदहोश मायावादियों से धर्माधर्म का भेद नहीं
परखा गया। डा0 शर्मा ने राममन्दिर भूमि पूजन और जश्न में शामिल धार्मिक संगठनों पर
आक्रोश जताया। कहा कि वक्त के उस नाजुक दौर में धर्म प्रचार स्वयं संगठनों के
अस्तित्व पर सवाल उठा रहा है] जब लाखों लोग कोरोना प्रकोप से काल-कवलित हो गये और
धर्माे रक्षति रक्षितः का सन्देश धरा का धरा रह गया। कहा कि कोरोना ने माना कि
मानवता के इतिहास में सबसे क्रूरतम कदम उठाया है। मगर इस बहाने धर्म और अध्यात्म की
धज्जियां भी उड़ गई जो लोक और परलोक के सुख की आड़ में जनता का शोषण करते आ रहे थे।
बैठक में पारसनाथ कुशवाहा, जितेन्द्र सिंह, अश्विनी कुमार, निर्मल प्रसाद, डाॅ0
धर्मचन्द विद्यालंकार उपस्थित थे।
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